हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में पुरुष अपनी भावनात्मक परेशानियां ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी अपनों को कम ही बताते हैं। सेहत से जुड़ी बहुत सी तकलीफों से खुद ही जूझते रहते हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपे अध्ययन के अनुसार, बचपन से ही लड़कियों की तुलना में लड़कों में भावनात्मक संवाद का अभाव होता है। व्यवहार का यह पक्ष जीवनभर उनकी मन:स्थिति को प्रभावित करता है। इसीलिए पुरुषों के लिए भी परिवार का सहयोग आवश्यक है। दरअसल अपनों की स्वास्थ्य समस्याओं के लिए भागदौड़ करना पुरुषों की फेहरिस्त में खुद के हेल्थ को संभालने से पहले आता है। जबकि जिंदगी की आपाधापी, कामकाजी भागदौड़ और तनावपूर्ण जीवनशैली पुरुषों के स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम भी बढ़ा रही है। गांव-देहात से लेकर महानगरों तक पुरुषों को स्वास्थ्य समस्याएं घेर रही हैं। अकसर माना जाता है कि कई बड़ी बीमारियों की जड़ कही जाने वाली आम सी हेल्थ प्रॉब्लम्स की शिकार महिलाएं ही ज्यादा होती हैं, पर हकीकत पुरुषों की सेहत के मोर्चे पर भी चेताने वाली है। जरूरी है कि घर के पुरुष सदस्य और उनके अपने भी इस मामले में सजग रहें।
एनीमिया की समस्या
खून की कमी शरीर में हर व्याधि के दस्तक देने की स्थितियां बना देती है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 में यह सामने आया है कि भारत के गांवों में हर 10 में से 3 पुरुष एनीमिया के शिकार हैं। वहीं शहरी इलाकों में हर 10 में से 1 पुरुष को खून की कमी है। पुरुषों के स्वास्थ्य से जुड़ी स्थितियों को सामने रखने वाले इस शोध को ग्लोबल पब्लिक हेल्थ जर्नल, ‘पलोसÓ में भी प्रकाशित किया गया है। आमतौर पर पुरुषों में खून की कमी पर ज्यादा गौर नहीं किया जाता। जबकि एनीमिया की वजह से पुरुषों की सेहत का भी हर पक्ष प्रभावित होता है। उक्त सर्वे से पहले मेडिकल जर्नल लैंसेट ने भी बताया था कि भारत में महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी एनीमिया से जूझ रहे हैं जो शारीरिक कमजोरी से लेकर इंफर्टिलिटी और रोग प्रतिरोधक क्षमता तक हर मामले में घातक है।
अवसाद और तनाव
पुरुषों में भावनात्मक उलझनों से जूझते हुए किसी से मदद लेने या खुलकर संवाद की आदत कम होती है। उनकी यह मनोदशा अकसर गुस्से या आक्रामकता के रूप में सामने आती है। कभी-कभी शराब, स्मोकिंग जैसी बुरी लत का भी शिकार बना देती है। असल में पुरुष से हर परिस्थिति में भावनात्मक मोर्चे पर मजबूत बने रहने की ही उम्मीद की जाती है। जिसके चलते उनके लिए अपना दुख- दर्द कहने का परिवेश बन ही नहीं पाया। यही वजह रही कि पीड़ा के दौर में अपनी मन:स्थिति को जाहिर करने वाली महिलाओं को ही तनाव और अवसाद का शिकार माना जाता है। पुरुषों में अवसाद के आंकड़े भी कम चिंतनीय नहीं हैं। पुरुषों की रौबीली भूमिका वाले भारतीय समाज में उनके मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर खुलकर चर्चा भी नहीं की जाती। जबकि हालिया बरसों में उनकी भूमिका से लेकर भावनात्मक समझ तक बहुत बदल गया है। घर के पुरुष सदस्य शारीरिक ही नहीं मानसिक और भावनात्मक परेशानियों का भी शिकार हैं। 2021 के एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि हमारे यहां खुदकुशी करने वाले हर 10 लोगों में 6 या 7 पुरुष होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वैश्विक स्तर पर भी आत्महत्या जैसा कदम पुरुष ही ज्यादा उठा रहे हैं। इसीलिए जरूरी है कि पुरुष खुद आगे आकर अपनी मनोदशा पर बात करें व उनके परिजन भी उनकी उलझनों को समझने का प्रयास करें।
मोटापे की मुसीबत
बहुत सी दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के समान मोटापे को भी आमतौर पर महिलाओं से ही जोड़कर देखा जाता है। गर्भावस्था और हार्मोनल बदलावों के कारण अनियंत्रित होते वजन को स्त्रियों के लिए मुसीबत माना जाता है। जबकि अनियमित दिनचर्या और सिटिंग जॉब्स के चलते पुरुषों में भी वजन बढऩे की समस्या देखने को मिल रही है। इस तरह की जीवनशैली का ही परिणाम है कि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में औसतन 10 साल पहले हृदय रोग विकसित होने की आशंका रहती है। फेफड़ों के कैंसर की व्याधि तो महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में अधिक देखने को मिलती है। तनावपूर्ण जीवनशैली के साथ ही शराब, धूम्रपान जैसी आदतें भी मोटापे को बढ़ाने वाली हैं। चिंता की बात है कि मोटापा बहुत सी दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं की भी जड़ है। उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, दिल की बीमारियां, हाई कोलेस्ट्रॉल और कुछ प्रकार के कैंसर तक, कई बीमारियों के पीछे ओबेसिटी एक बड़ी वजह है।

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