क्या आप भी दिन का बचा चावल रात में और रात का बचा चावल दिन में खाते हैं. अगर हां तो सावधान हो जाइए, क्योंकि यह एक साथ कई बीमारियों को दावत देने जैसा है और दिल के लिए तो बेहद खतरनाक होता है. इसलिए खाने की इस आदत को तुरंत छोड़ देना चाहिए. आइए जानते हैं बासी चावल खाना क्यों नुकसानदायक होता है…
बासी चावल के नुकसान
बासी चावल खाने से पेट और पाचन से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. दरअसल, बासी चावल में बैक्टीरिया काफी ज्यादा बढ़ जाते हैं, जो पेट में इंफेक्शन की वजह बन सकते हैं. इसके अलावा पेट दर्द, डायरिया, दस्त, उल्टी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. बासी चावल दिल की बीमारियों का भी कारण बनता है. इंडीपेंट्स की रिपोर्ट के अनुसार, बासी चावल खाने से फूड पॉइजनिंग की प्रॉब्लम हो सकती है. रिपोर्ट में बताया गया है कि, कच्चे चावल में स्पोर्स पाए जाते हैं, जो पकाते समय भी मौजूद रहते हैं लेकिन चावल गरम होने से ये जीवाणु शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं. जब चावल को कई घंटे तक रूम टेंपरेचर पर रख दिया जाता है तो स्पोर्स बैक्टीरिया में बदल जाता है और जब यह बैक्टीरिया शरीर में पहुंचता है तो बीमार बना सकता है.
बासी चावल से दिल को खतरा
चावल को जब काफी देर तक रख देते हैं तो वह कंटेमिनेट हो जाता है, जिसे फ्राइड राइस सिंड्रोम कहा जाता है. ये पेटे से लेकर कई तरह की बीमारियों की वजह बन जाता है. इसके अलावा बासी चावल कार्डियोवस्कुलर डिजीज यानी हार्ट से जुड़ी बीमारियों का कारण भी बनता है. मैनचेस्टर और सलफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च में पाया गया है कि जिस जगह चावल की खेती की जाती है, वहां की मिट्टी में आर्सेनिक काफी ज्यादा होती है. चूंकि चावल की खेती में काफी ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है. खेतों में धान की फसल पूरी तरह पानी में डूबी रहती है. जिससे आर्सेनिक की मात्रा बढ़ जाती है. जब आर्सेनिक दूसरे टॉक्सिन्स के साथ मिलता है तो दिल की बीमारियों का कारण बन जाता है. बासी चावल खाने से ये समस्या और भी ज्यादा बढ़ जाती है.
अगर चावल को गर्म कर लिया जाए तो
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि अगर चावल को दोबारा से गर्म कर लिया जाए तो उसे खाना नुकसानदायक नहीं होता है लेकिन ऐसा नहीं है, दरअसल, किसी भी तरह का स्टार्ची फ़ूड, जिसमें टॉक्सिन्स प्रोड्यूस होता है, हीट को लेकर रेसिस्टेंट माने जाते हैं. ऐसे में बासी चावल को गर्म कर उसके बैक्टीरिया को खत्म नहीं किया जा सकता है.

