किसी उबाऊ व्याख्यान या मीटिंग में बैठे-बैठे झपकी लग जाना कोई असामान्य बात नहीं है। अलबत्ता, वाहन चलाते वक्त झपकी लगना हमारी जान के लिए खतरा साबित हो सकता है। लेकिन साइंस पत्रिका में प्रकाशित हालिया अध्ययन बताता है कि अंटार्कटिका की चिनस्ट्रैप पेंगुइन  को महज 4-4 सेकंड की झपकियों वाली नींद जीवित रहने में मदद करती है। सोचें तो लगता है कि इतनी छोटी झपकियों से वे कितना ही सो पाते होंगे? लेकिन इन छोटी-छोटी झपकियों से वे दिन भर में पूरे 11 घंटे सो लेते हैं। इस तरह थोड़ा सोना, थोड़ा जागना उन्हें अपने अंडों और चूज़ों की पहरेदारी करने और आराम करने दोनों में मदद करता है। दरअसल कोरिया पोलर रिसर्च इंस्टीट्यूट के व्यवहार पारिस्थितिकी विज्ञानी वोन यंग ली ने 2014 में पहली बार पेंगुइन को इस तरह झपकियां लेते हुए देखा था – बस सोए और जाग गए, फिर सोए और जाग गए, फिर सोए… ऐसा ही चल रहा था। उन्हें यह तो मालूम था कि कृत्रिम आवासों में पेंगुइन की कई प्रजातियां अक्सर लंबी नींद की बजाय छोटी-छोटी नींद लेती हैं। लेकिन प्रकृति में वे कैसा व्यवहार करते हैं। लंबी नींद की अपेक्षा क्षणिक झपकियां उन्हें क्या फायदा पहुंचाती हैं। इसे समझने के लिए ली और उनके साथियों ने अंटार्कटिका के किंग जॉर्ज द्वीप की चिनस्ट्रैप पेंगुइन की एक कॉलोनी का अध्ययन किया। उस समय यह इलाका शोरगुल वाला, बदबूदार और भीड़भाड़ वाला था, और पेंगुइन अभिभावक लगातार शिकारी समुद्री पक्षियों और अन्य पेंगुइनों से अपने अंडों और चूज़ों की रक्षा में व्यस्त थे। शोधकर्ताओं ने पेंगुइन की मस्तिष्क और मांसपेशियों की गतिविधि एवं शरीर की स्थिति देखने के लिए 14 पेंगुइन पर डैटा लॉगर और एक्सेलेरोमीटर लगाए। नींद सम्बंधी व्यवहार, जैसे आंखें बंद करना और सिर ढलक जाना भी रिकॉर्ड किया गया। डैटा लॉगर्स का विश्लेषण करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि पेंगुइन दिन भर में औसतन 4-4 सेकंड की करीब 10,000 झपकियां लेते हैं; इस तरह कुल मिलाकर वे करीब आधा दिन सोते हैं। यहां तक कि समुद्र में भोजन तलाश के दौरान भी वे कभी-कभी इसी तरह झपकियां ले लेते हैं। ऐसी विलक्षण क्षमता किसी भी अन्य प्रजाति में नहीं देखी गई है। इसके अलावा उनकी मस्तिष्क तरंग रिकॉर्डिंग से पता चला है कि लघु नींद लेते हुए भी पेंगुइन तथाकथित स्लो वेव निद्रा में चले जाते है। स्लो वेव निद्रा मनुष्य के लिए आराम, और मरम्मत व बहाली जैसे कामों के लिए महत्वपूर्ण है। यही नींद हमें सबसे अधिक लाभ देती है। गौरतलब है कि झपकियां लेते हुए हम मनुष्य कभी तृतीय चरण की निद्रा में प्रवेश नहीं कर पाते। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये संक्षिप्त नींद चिनस्ट्रैप्स पिंगुइन को लंबी नींद के कुछ फायदे देती होंगी – जैसे सायनेप्स (तंत्रिका के जुड़ाव) का पुनर्गठन करना और मस्तिष्क में विषाक्त अपशिष्ट पदार्थों की सफाई करना। हालांकि, अन्य शोधकर्ता यह संभावना भी जताते हैं कि ये संक्षिप्त झपकियां शायद शोर-शराबे वाले, तनावपूर्ण माहौल में गहरी और लंबी नींद की असफलता का परिणाम हों। इसे पुख्ता तौर पर समझने के लिए चिनस्ट्रैप पेंगुइन की नींद पर उनके प्रजनन काल के इतर और तुलनात्मक रूप से अधिक शांत माहौल में अध्ययन करके देखना ज़रूरी होगा। शोधकर्ताओं की योजना भी विभिन्न जीवों की नींद पर आगे अध्ययन जारी रखने की है। वे ध्रुवों (जहां गर्मियों में 24 घंटे सूर्य की रोशनी होती है) पर रहने वाले वेडेल सील्स जैसे अन्य ध्रुवीय जंतुओं की नींद पर उनके प्राकृतवास में ही अध्ययन करना चाहते हैं यह तो ज़ाहिर है कि सभी जानवर इंसानों की तरह नहीं सोते हैं। विभिन्न जानवर कैसे सोते हैं, इस बारे में अधिक से अधिक जानकारी मिलने पर यह समझने में मदद मिलेगी कि नींद को किस तरह परिभाषित किया जाए और यह किस मकसद की पूर्ति करती है। (स्रोत फीचर्स) 

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