आज के वक्त लंबी का दूरी का सफर अधिकांश लोग फ्लाइट से करना पसंद करते हैं. आपने भी अगर फ्लाइट में सफर किया होगा, तो आपने शायद देखा होगा कि एयरपोर्ट पर फ्लाइट टेकऑफ करने से पहले उसमें फ्यूल भरा जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि फ्लाइट में कितना फ्यूल भरा जाता है और आसमान में फ्यूल खत्म होने की स्थिति में पायलट क्या करता है. आप सोचिए कि अगर फ्लाइट में फ्यूल खत्म होगा तो क्या उससे फ्लेन क्रैश कर जाएगा? जानिए इसके पीछे क्या तकनीक काम करती है.
फ्लाइट में फ्यूल
किसी भी एयरपोर्ट से फ्लाइट के टेकऑफ के समय उसमें भरपूर मात्रा में फ्यूल भरा जाता है. जिससे फ्लाइट अपनी दूरी तक सफर कर सके. फ्लाइट में ज्यादा फ्यूल इसलिए भी नहीं भरा जाता है, क्योंकि लैंडिंग के समय ज्यादा फ्यूल होने से प्रेशर के कारण बड़ी घटना हो सकती है.
आसमान में कैसे भरा जाता है फ्यूल
अब सवाल ये है कि किसी कारण अगर फ्लाइट में फ्यूल खत्म होता है, तो उसमें फ्यूल कैसे भरा जाता है. बता दें कि जब भी हवा में उड़ रहे प्लेन का पेट्रोल खत्म होने लगता है, तो इंडिकेटर की मदद से पायलट को यह पता चल जाता है. जिसके बाद पायलट यह जानकारी कंट्रोल रूम तक भेजता है, कंट्रोल रूम सबसे पास के इलाके से एक फ्यूल से भरे दूसरे फ्लाइट को आसमान में तेजी से भेजता है. वहीं जब फ्यूल से भरा प्लेन पहले वाले प्लेन के पास पहुंचता है तो दोनों प्लेन एक दूसरे के साथ पैरेलल एक ही स्पीड में उड़ान भरते हैं.
फ्लाइट में कब फ्यूल हुआ खत्म
फ्लाइट में अमूमन ऐसा नहीं होता है, क्योंकि प्लेन के उड़ाने से पहले इसकी गहराई से जांच की जाती है. क्योंकि गलती से भी ईंधन पर ध्यान नहीं देने से बड़ा हादसा हो सकता है. लेकिन इतिहास में फ्यूल खत्म होने की बड़ी घटना दर्ज है. बता दें कि 1983 में कनाडा के टोरेंटो शहर से पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन के लिए एक प्लेन ने उड़ान भरी थी. इस फ्लाइट का नंबर 236 (flight 236) था. ये एक एयरबस A330विमान था. जिसमें रॉल्स रॉयस के दो ताकतवर इंजन लगे हुए थे. वहीं इस प्लेन में कक्रू और पायलट को मिलाकर कुल 306 लोग सवार थे.
अटलांटिक महासागर के ठीक ऊपर 39 हजार फीट की ऊंचाई पर पायलट को ये एहसास हुआ था कि प्लेन में ईंधन खत्म हो रहा है, जिसका सिग्नल उनके सामने स्क्रीन पर दिख रहा था. लेकिन उन्हें इसके पीछे का कारण नहीं पता था. हालांकि फ्यूल खत्म होने के बाद गंभीर स्थिति में पायलटों ने सबसे नजदीक लाजेस नाम के एक द्वीप पर बना एक मिलिट्री एयर पोर्ट पर लैंडिग की योजना बनाई.
अनुभवी पायलट कैप्टन रॉबर्ट पिशे ने अपनी सूझबूझ के साथ मौका देखकर उन्होंने प्लेन को रनवे पर उतार दिया. हालांकि फ्यूल खत्म होने के कारण प्लेन रनवे से टकराकर एकदम बॉल की तरह उछला था और फिर नीचे आया था. वहीं तेज स्पीड के कारण उसके पहिये फट गए और बॉडी में दरार आ गई थी. लेकिन प्लेन ने सुरक्षित लैंडिग की थी और सब लोग को सुरक्षित उतारा था, हालांकि इस दौरान 16 लोगों को मामूली चोट आई थी.
फ्लाइट का फ्यूल टैंक कितना बड़ा?
क्या आप जानते हैं कि फ्लाइट का फ्यूल टैंक कितना बड़ा होता है? बता दें कि किसी भी फ्लाइट का फ्यूल टैंक उसके साइज पर निर्भर करता है. जैसे एयरबस ए380 के फ्यूल टैंक में 323,591 लीटर, बोइंग 747 में 182,000 लीटर तेल आता है. वहीं छोटे जहाजों की फ्यूल टैंक कैपिसिटी 4000–5000 लीटर की होती है. इसके अलावा मझोले विमानों की 26000 से 30000 लीटर फ्यूल टैंक कैपिसिटी होती है.

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