किसी भी राज्य की पहचान वहां की भाषा और संस्कृति के माध्यम से होती है। इसी को आधार मानकर इस देश में भाषाई एवं सांस्कृतिक आधार पर राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापन की गई थी, और नये राज्यों का निर्माण भी हुआ। छत्तीसगढ़ को अलग राज्य के रूप में स्वतंत्र अस्तित्व में आये दो दशक होने वाला है। लेकिन अभी भी उसकी स्वतंत्र भाषाई एवं सांस्कृतिक पहचान नहीं बन पाई है। स्थानीय स्तर पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की स्थापना कर छत्तीसगढ़ी को हिन्दी के साथ राजभाषा के रूप में मान्यता दे दी गई है, लेकिन अभी तक उसका उपयोग केवल खानापूर्ति कर लोगों को ठगने के रूप में ही किया जा रहा है। यहां के राजकाज या शिक्षा में इसकी कहीं कोई उपस्थिति नहीं है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के क्षेत्र में तो और भी दयनीय स्थिति है। यहां की मूल संस्कृति की तो कहीं पर चर्चा ही नहीं होती। अलबत्ता यह बताने का प्रयास जरूर किया जाता है, कि अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथ और उस पर आधारित संस्कृति ही छत्तीसगढ़ की संस्कृति है। छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढय़िा के नाम पर यहां समय-समय पर आन्दोलन होते रहे हैं, और आगे भी होते रहेंगे। लेकिन एक बात जो अधिकांशत: देखने में आयी, वह यह कि कुछ लोग इसे राजनीतिक चंदाखोरी के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते रहे। जब राजनीतिक स्थिति डांवाडोल दिखती तो छत्तीसगढय़िा का नारा बुलंद करने लगते, और रात के अंधेरे में उन्हीं लोगों से पद या पैसा की दलाली करने लगते, जिनके कारण मूल छत्तीसगढय़िा आज भी उपेक्षित है। आश्चर्यजनक बात यह है कि आज तक इस राज्य में यहां की मूल संस्कृति के नाम पर कहीं कोई आन्दोलन नहीं हुआ है। जो लोग छत्तीसगढय़िा या छत्तीसगढ़ी भाषा के नाम पर आवाज बुलंद करते रहे हैं, ऐसे लोग भी संस्कृति की बात करने से बचते रहे हैं। मैंने अनुभव किया है, कि ये वही लोग हैं, जो वास्तव में आज भी जिन प्रदेशों से आये हैं, वहां की संस्कृति को ही जीते हैं, और केवल भाषा के नाम छत्तीसगढय़िा होने का ढोंग रचते हैं। जबकि यह बात सर्व विदित है कि किसी भी राज्य या व्यक्ति की पहचान उसकी संस्कृति ही होती है। ऐसे लोग एक और बात कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के मूल निवासी तो केवल आदिवासी हैं, उसके बाद जितने भी यहां हैं वे सभी बाहरी हैं, तो फिर यहां की मूल संस्कृति उन सभी का मानक कैसे हो सकती है? ऐसे लोगों को मैं याद दिलाना चाहता हूं कि यहां पूर्व में दो किस्म के लोगों आना हुआ है। एक वे जो यहां कमाने-खाने के लिए कुदाल-फावड़ा लेकर आये और एक वे जो जीने के साधन के रूप में केवल पोथी-पतरा लेकर आये। जो लोग कुदाल-फावड़ा लेकर आये वे धार्मिक- सांस्कृतिक रूप से अपने साथ कोई विशेष सामान नहीं लाए थे, इसलिए यहां जो भी पर्व-संस्कार था, उसे आत्मसात कर लिए। लेकिन जो लोग अपने साथ पोथी-पतरा लेकर आये थे, वे यहां की संस्कृति को आत्मसात करने के बजाय अपने साथ लाये पोथी को ही यहां के लोगों पर थोपने का उपक्रम करने लगे, जो आज भी जारी है। इसीलिए ये लोग आज भी यहां की मूल संस्कृति के प्रति ईमानदार नहीं हैं। जहां तक भाषा की बात है, तो भाषा को तो कोई भी व्यक्ति कुछ दिन यहां रहकर सीख और बोल सकता है। हम कई ऐसे लोगों को देख भी रहे हैं, जो यहां के मूल निवासियों से ज्यादा अच्छा छत्तीसगढ़ी बोलते हैं, लेकिन क्या वे यहां की संस्कृति को भी जीते हैं? उनके घरों में जाकर देखिए वे आज भी वहीं की संस्कृति को जीते हैं, जहां से लोटा लेकर आये थे। ऐसे में उन्हें छत्तीसगढय़िा की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है ? ऐसे लोग यहां की कुछ कला को जिसे मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, उसे ही संस्कृति के रूप में प्रचारित कर लोगों को भ्रमित करने की कुचेष्ठा जरूर करते हैं। जबकि संस्कृति वह है, जिसे हम संस्कारों के रूप में जीते हैं, पर्वों के रूप में जीते हैं। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है, कि हम अपनी मूल संस्कृति को जानें, समझें, उसकी मूल रूप में पहचान कायम रखने का प्रयास करें और उसके नाम पर पाखण्ड करने वालों के नकाब भी नोचें। छत्तीसगढ़ी या छत्तीसगढय़िा आन्दोलन तब तक पूरा नहीं सकता, जब तक उसकी आत्मा अर्थात संस्कृति उसके साथ नहीं जुड़ जाती।
0 सुशील भोले, रायपुर (छ.ग.)

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