राजनांदगांव। लोग क्या कहेंगे…, यह सोच बदलते ही एक परिवार की जिंदगी अब फिर से खूबसूरत हो गई है। उस परिवार का संदेश है-खूबसूरत जिंदगी पाने के लिए सोच को बदलना बहुत जरूरी है। विज्ञान के इतना तरक्की कर लेने के बाद भी लोग मानसिक बीमारी के बारे में बात करने में यदि शर्म या संकोच करे तो यह बिल्कुल ठीक नहीं है। पिछले कुछ दशकों से मानसिक स्वास्थ्य समाज के लिए एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। तभी हर साल पूरे विश्व में 10 अक्टूबर को मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है और इस अवसर पर मानसिक विकारों के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जाता है। इसका उद्देश्य पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और मानसिक स्वास्थ्य के समर्थन में प्रयास करना है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का जिक्र होने पर राजनांदगांव शहर से सटे एक गांव में निवासरत एक परिवार की महिला सुमन (बदला हुआ नाम) ने बताया, मानसिक विकार की शुरूआत में पति राहुल (बदला हुआ नाम) की असहज हरकतें देखकर मन बहुत दुखी हो जाता था। गांव में कई लोग उनका मजाक उड़ाते थे और तभी मैंने भी यह तय कर लिया था कि मैं उनका इलाज तो कराकर ही रहूंगी। आस-पड़ोस वालों से इस बारे में चर्चा की तो कुछ लोगों ने डॉक्टर से मिलने के लिए कहा। वहीं कुछ लोगों ने यह भी कहा किए यह तो झाड-फूंक से भी ठीक हो जाएगा। सुमन बताती हैं हम दोनों पति-पत्नी ग्रेजुएट शिक्षित हैं और शिक्षित होने का ही नतीजा है कि मैंने अपने पति का डॉक्टरी इलाज कराना ही बेहतर समझा। इस बारे में सास-ससुर की भी सहमति से राजनांदगांव व रायपुर के विभिन्न अस्पतालों में उनका उपचार कराया और अब राहुल बिल्कुल स्वस्थ हैं। सुमन अब यह बात भी सहज रूप से कहती हैं कि, मैं यदि लोगों के तानों में ही उलझकर रह गई होती और पति के डॉक्टरी इलाज को लेकर गंभीर नहीं हुई होती तो न जाने हमारी जिंदगी का क्या होता, लेकिन अब सब अच्छा है और हमारी जिंदगी भी फिर से बहुत खूबसूरत है। इस बारे में मनोरोग चिकित्सक मेडिकल कालेज राजनांदगांव के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. शरद मनोरे का कहना है, व्यस्त जीवनशैली में मनोविकार के लक्षणों को भांपना बहुत जरूरी है। खासकर, किशोरावस्था और वयस्कता का शुरूआती साल जीवन का वह समय होता है, जब कई बदलाव होते हैं। उदाहरण के लिए स्कूल बदलना, घर छो?ना, नया कॉलेज, यूनिवसिर्टी या नई नौकरी शुरू करना। कई लोगों के लिए ये रोमांचक समय होता है तथा कुछ मामलों में यह तनाव और शंका के कारण भी बन जाते हैं। कई लाभों के साथ आनलाइन प्रौद्योगिकियों का भी बढ़ता उपयोग इस आयु वर्ग के लोगों के लिए अतिरिक्त दबाव लाया है और समय रहते यदि इसे पहचाना नहीं जाता है तो यह तनाव मानसिक रोग उत्पन्न कर सकता है।
यह प्रयास भी जरूरी है
बच्चों के माता-पिता और शिक्षक घर एवं स्कूल में रोजमर्रा की चुनौतियों का मुकाबला करने में सहयोग के लिए बच्चों और किशोरों के जीवन कौशल निर्माण करने में मदद कर सकते हैं। जैसे कि सामाजिक कौशल, समस्या सुलझाने का कौशल और आत्मविश्वास बढ़ाना।
क्या हैं मानसिक रोग
डा. मनोरे बताते हैं, मानसिक विकार की श्रेणी बहुत ही लंबी-चौड़ी है। 300 से अधिक मानसिक बीमारियां हैं। इसमें मस्तिष्क से जुड़े हर तरह की समस्याओं को शामिल किया जा सकता है। जैसे पार्किंसन, अल्जाइमर, आटिज्म, डिस्लेक्सिया, डिप्रेशन, तनाव, चिंता, कमजोर याददाश्त, डर, भूलने की बीमारी और भी बहुत-सी है। डा. मनोरे ने बताया, हर मानसिक रोग के लिए चिकित्सा की अलग पद्धति की जरूरत होती है और समय रहते इलाज के माध्यम से इसे ठीक किया जा सकता है। अगर व्यक्ति तनाव या डिप्रेशन का शिकार है तो मनोचिकित्सक की सलाह और दवाईयों के माध्यम से इसे ठीक किया जा सकता है।

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