बिलासपुर जिले के पूर्व बीईओ और वर्तमान डीईओ विजय तांडे एक बार फिर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिर गए हैं। स्कूल शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल से तांडे के पुराने कार्यकाल में कोटा ब्लॉक में हुए फर्जीवाड़े और रिश्वतखोरी के मामले में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए शासन स्तर पर बड़ी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

क्या है पूरा मामला?
विजय तांडे पर आरोप है कि कोटा बीईओ रहते हुए उन्होंने विधवा शिक्षिका नीलम भारद्वाज से उनके दिवंगत पति के देयकों के भुगतान के बदले में ₹1.34 लाख की रिश्वत की मांग की। यह रकम क्लर्क एकादशी पोर्ते द्वारा तांडे के कहने पर वसूली गई। इसके अलावा, जांच में खुलासा हुआ कि तांडे ने शिक्षिका के करीब डेढ़ महीने की सैलरी रोककर उसे अपने बैंक खाते में जमा कराया और भुगतान में देरी की।

शपथ पत्र से सामने आए चौंकाने वाले तथ्य
पीड़िता नीलम भारद्वाज ने अपने शपथ पत्र में बताया कि उसके दिवंगत पति की मृत्यु के बाद मिलने वाली सरकारी राहत राशि के बदले रिश्वत मांगी गई। बीमा और मेडिकल रिइम्बर्समेंट की राशि आज तक नहीं मिली। रिश्वत नहीं देने पर पेंशन फाइल रोकने की धमकी दी गई।

पूर्व कलेक्टर अवनीश शरण ने की थी जांच, मिली थी पुष्टि

तत्कालीन कलेक्टर अवनीश शरण ने शिकायत पर तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की थी। 21 मार्च 2025 को सौंपी गई रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि तांडे और पोर्ते ने मिलकर शिक्षिका से वसूली की। तांडे ने नियमों को ताक पर रखकर 66 दिन की अतिरिक्त वेतन राशि ₹1,48,610 भी निकाल ली थी। राशि आहरण के बाद भी एक महीने से अधिक समय तक भुगतान नहीं किया गया।

तबादले में भी गड़बड़ी का आरोप
तांडे पर शिक्षक शैलेष यादव के गलत स्थान पर जॉइनिंग कराने का भी आरोप है। शासन ने तबादला धौराभाठा (बिल्हा) के लिए किया था, लेकिन तांडे ने नियमों को दरकिनार कर शिक्षक को धौराभाठा (कोटा) में पदस्थ कर दिया।

अब तक नहीं हुई विभागीय जांच
जांच समिति ने विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की थी, लेकिन रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गई। अब जब तांडे को बिलासपुर जैसे बड़े जिले का डीईओ बना दिया गया है, तो शासन और सिस्टम की निष्क्रियता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

स्कूल शिक्षा सचिव ने रिपोर्ट मांगी, कार्रवाई संभव
अब स्कूल शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने बिलासपुर कलेक्टर से रिपोर्ट तलब की है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट के आधार पर तांडे के खिलाफ विभागीय जांच से लेकर निलंबन तक की कार्रवाई हो सकती है।

सवाल जो उठ रहे हैं:
क्या रिश्वतखोरी और वेतन गबन के आरोपी अधिकारी को डीईओ जैसे अहम पद पर बैठाना प्रशासनिक लापरवाही नहीं?
क्यों अब तक विभागीय जांच शुरू नहीं हुई?
क्या राज्य सरकार भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण दे रही है?

बीईओ रहते शिक्षिकाओं से वसूली, वेतन हड़पने, और सरकारी आदेशों को तोड़ने वाले विजय तांडे को डीईओ बनाना प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा सवाल है। अब सभी की नजर स्कूल शिक्षा विभाग पर टिकी है—क्या यह सिर्फ रिपोर्ट तक सीमित रहेगा या दोषियों पर सख्त कार्रवाई भी होगी?

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