रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित सरस्वती शिक्षा मंदिर, छत्तीसगढ़ नगर में जारी गीता ज्ञान अमृत वर्षा कथा के दौरान रविवार को परम पूज्य गुरुदेव श्री संकर्षण शरण जी (गुरुजी), प्रयागराज वाले ने अपने श्रीमुख से दिव्य प्रवचन दिया। व्यासपीठ की पूजा अर्चना करने के बाद कथा की शुरुआत करते हुए गुरुजी ने कहा कि गीता सबसे सरल ग्रंथ है, और जो इसे अपनाता है उसका जीवन भी सरल हो जाता है। उन्होंने कहा कि गीता को समझने वाला व्यक्ति प्रेम, आनंद और शांति में डूब जाता है, किंतु मनुष्य इसे सरल समझा ही नहीं क्योंकि मनुष्य जटिल होते हैं, इसलिए उसे गीता भी कठिन लगती है।
गुरुजी ने आगे कहा कि धर्म के क्षेत्र में संघर्ष सदैव से चला आ रहा है। अधर्मी हमारे बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर ही विद्यमान हैं। उन्होंने समझाया कि हमारा अपना शरीर ही कुरुक्षेत्र है, हमारे मन में ही तरह-तरह के विचार उठते हैं, और यही धर्म-अधर्म की वास्तविक लड़ाई है। गुरुजी ने कहा कि धर्म और अधर्म, सद्गुण और दुर्गुण के बीच संघर्ष मनुष्य के भीतर और बाहर दोनों ओर चलता रहता है, लेकिन अंत में सद्गुण की ही विजय होती है।
उन्होंने बताया कि धर्म जोड़ने का कार्य करता है, जबकि अधर्म मनुष्य को तोड़ता है। हर व्यक्ति के भीतर तीन गुण सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण निवास करते हैं। हमारा आहार और आचरण जिस गुण के अनुरूप होता है, वही हमारे जीवन में प्रबल हो जाता है। इसलिए हमें सतोगुणी प्रवृत्ति अपनाने की आवश्यकता है।
गुरुजी ने कहा कि आज मनुष्य चिंता में जी रहा है क्योंकि वह असत्य के प्रति चिंतित है। उन्होंने कहा “जब तक हम धन, पद और प्रतिष्ठा की चिंता करते रहेंगे, जीवन में चिंता बनी रहेगी। जब परमात्मा का चिंतन करेंगे, तब चिंता स्वतः समाप्त हो जाएगी।”
कार्यक्रम स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और भक्तजन उपस्थित रहे और गुरुजी के दिव्य वचनों का श्रवण किया। आयोजक श्रीमती इंद्राणी शरद दुबे एवं परिवार ने बताया कि कथा का आयोजन प्रतिदिन दोपहर 3:00 से 5:00 बजे तक हो रहा है और 8 अक्टूबर को भव्य हवन के साथ इसका समापन किया जाएगा।

