शहर की सफाई व्यवस्था से सुधार लाने के लिए में नगर निगम प्रशासन सबसे अधिक खर्च करता है। अलग-अलग सफाई गैंग के अलावा हर वार्ड की जनसंख्या के हिसाब से सफाई ठेका दिया गया है, लेकिन मॉनिटरिंग के अभाव और मिलीभगत के खेल के चलते सफाई में पलीता लग रहा है। औचक रूप से जब-जब वार्डो में जांच की गई तो हर जगह तय संख्या से 15 से 20 सफाई कामगार कम मिले। इसके बाद जिम्मेदारों केवल 10 से 15 हजार जुर्माना लगाकर मामले को रफा-दफा करने का काम किया। अब सफाई ठेकेदार ने भुगतान को लेकर निगम प्रशासन को सफाई ठप करने का अल्टीमेटम दिया है।
निगम के 70 वार्डो का सफाई ठेका अलग-अलग है, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता रैकिंग बढ़ाई जा सके। इसलिए किसी वार्ड में 40 तो किसी में 45 सफाई कामगारों की संख्या के हिसाब से ठेकेदारों का भुगतान किया जाता है। इसके बावजूद न तो नालियां साफ होती हैं और न ही गलियों और सड़को में झाडू लगती है। महीने में मुश्किल से शहर के अंदरूनी क्षेत्रों की सफाई कराई जाती है। यही वजह है कि हमेशा कचरा सड़कों के किनारे और कॉलोनियों की खाली जगहों पर फैलते रहता है। ऐसी स्थिति को लेकर ही महापौर मीनल चौबे कई बार की बैठकों में कड़ी फटकार लगा चुकी है। उन्होनें यहां तक सवाल उठाया कि जब रामकी कंपनी घर-घर से कचरा कलेक्शन कर रही तो सड़कों और मुक्कड़ों में कैसे नजर आता है। इसलिए डोर टू डोर गाड़ी की मॉनिटरिंग कराई जाए और वार्डो की सफाई नहीं होने की जिम्मेदारी जोन कमिश्ररों की तय की जाएगी।

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