Uddhav and Raj Thackeray: स्थानीय निकाय चुनावों में हार के बाद उद्धव और राज ठाकरे की शिवसेना यूबीटी और मनसे के बीच गठबंधन की चर्चा तेज हो गई है. वे 2026 में बीएमसी चुनाव में एक साथ मिलकर लड़ना चाहते है. वे करीब-करीब मान चुके हैं कि अब भाजपा के मुकाबले के लिए उनको एकजुट होना ही होगा.
महाराष्ट्र के हालिया स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे घोषित होने के बाद शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के बीच गठबंधन की संभावना एक बार फिर सुर्खियों में है. ठाकरे बंधु यानी उद्धव और राज ठाकरे लंबे समय से राजनीतिक रूप से अलग-थलग रहे हैं. वे अब एक साथ आने की तैयारी में हैं. लेकिन सवाल यह है कि आखिर वे साथ क्यों आ रहे हैं? क्या यह एक रणनीतिक कदम है या फिर वे किसी बड़ी चिंता से प्रेरित हैं? इस विश्लेषण में हम स्थानीय निकाय चुनावों के प्रदर्शन को केंद्र में रखते हुए इस गठबंधन की वजहें और भावी बीएमसी चुनावों में इसके प्रभाव को तलाशेंगे.
हालिया, स्थानीय निकाय चुनावों में महायुति (भाजपा, शिवसेना और एनसीपी) ने जबरदस्त प्रदर्शन किया. भाजपा ने 117 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष पद जीते, जबकि शिवसेना और एनसीपी को पांच और चार जगहों पर जीत मिली. दूसरी ओर एमवीए (शिव सेना-यूबीटी, कांग्रेस, और एनसीपी-एसपी) को कुल 44 अध्यक्ष पदों पर ही संतोष करना पड़ा, जिसमें शिव सेना-यूबीटी की दो और कांग्रेस की 11 जीतें शामिल थीं. मनसे का प्रदर्शन और भी निराशाजनक रहा, जिसने केवल एक अध्यक्ष पद जीता.
राज्य में महायुति का राज
इन नतीजों से साफ है कि महायुति ने राज्य में अपनी पकड़ मजबूत की है, जबकि विपक्षी दलों, विशेषकर शिव सेना-यूबीटी और मनसे को गंभीर झटका लगा है. शिव सेना-यूबीटी एक समय मुंबई और महाराष्ट्र में हावी थी, अब तीसरे सबसे बड़े दल एनसीपी से भी पीछे है. मनसे जो कभी माराठी अस्मिता का प्रतीक थी, अब अपनी प्रासंगिकता खोती दिख रही है.
ऐसे में दोनों दलों के लिए 2026 में होने वाले बीएमसी चुनाव बेहद अहम हो गए हैं. उद्धव और राज ठाकरे के बीच गठबंधन की संभावना इसलिए मजबूत हो रही है, क्योंकि दोनों दलों को महसूस हो रहा है कि वे अकेले भाजपा की ताकत का मुकाबला नहीं कर सकते. स्थानीय निकाय चुनावों में मिली हार ने उन्हें यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि वे मुंबई जैसे महत्वपूर्ण शहर में भाजपा को चुनौती देना चाहते हैं, तो उन्हें एकजुट होना ही होगा. बीएमसी में लंबे समय से शिवसेना का दबदबा रहा है. लेकिन वह अब बिखक गई है. दूसरी ओर भाजपा अब और मजबूत हो गई है. ऐसे में विपक्षी दलों के लिए उसकी चुनौती बढ़ गई है.
वोट बैंक बंटने का डर
इसके अलावा, दोनों दलों को यह भी डर है कि यदि वे अलग-अलग लड़ते हैं, तो उनका वोट बैंक बंट जाएगा, जिससे भाजपा को फायदा होगा. उद्धव ठाकरे के लिए, शिव सेना-यूबीटी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है, और उन्हें कांग्रेस और एनसीपी-एसपी जैसे सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जो मुंबई में उतनी मजबूत नहीं हैं.
राज ठाकरे जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए प्रचार किया था, अब महसूस कर रहे हैं कि मनसे को अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए एक नई रणनीति की जरूरत है. बीएमसी चुनावों में मुंबई की 227 वार्डों में से प्रत्येक वार्ड की आबादी और राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण होंगे.
यदि उद्धव और राज ठाकरे साथ आते हैं तो वे भाजपा को चुनौती देने के लिए एक मजबूत वोट बैंक बना सकते हैं, विशेषकर माराठी वोटरों के बीच. हालांकि, गठबंधन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे सीट बंटवारे और रणनीति पर कैसे सहमत होते हैं.

