विनोद कुमार शुक्ल के बारे में ये पंक्तियां 2022 में उन पर निकले आजकल पत्रिका के विशेषांक की हैंविनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे. ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिंदी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल (88 वर्ष) का मंगलवार को रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया. वे पिछले कुछ दिनों से क्रिटिकल केयर यूनिट में गंभीर श्वसन रोग से पीड़ित थे. एम्स ने उनके निधन की घोषणा की है. उनके पुत्र शाश्वत शुक्ल ने पीटीआई को बताया कि सांस लेने में तकलीफ होने के बाद शुक्ल को इस महीने की दो तारीख को रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान :एम्स: में भर्ती कराया गया था जहां आज शाम 4.48 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली.

लेखक, कवि और उपन्यासकार शुक्ल (88 वर्ष) की पहली कविता 1971 में ‘लगभग जयहिंद’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी. उनके प्रमुख उपन्यासों में ‘नौकर की कमीज’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘खिलेगा तो देखेंगे’ शामिल हैं. शुक्ल के उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल ने 1999 में इसी नाम से एक फिल्म बनायी थी. उनका लेखन सरल भाषा, गहरी संवेदनशीलता और अद्वितीय शैली के लिए जाना जाता है. वह मुख्य रूप से हिंदी साहित्य में अपने प्रयोगधर्मी लेखन के लिये प्रसिद्ध हैं. शुक्ल को साहित्य अकादमी पुरस्कार और अन्य प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है.

शाश्वत ने बताया कि शुक्ल के पार्थिव शरीर को पहले उनके निवास स्थान ले जाया जाएगा. उनके अंतिम संस्कार के संबंध में जल्द ही जानकारी दी जाएगी.

उन्होंने बताया कि दो दिसंबर को अचानक तबीयत अधिक बिगड़ने के बाद उन्हें रायपुर एम्स ले जाया गया जहां उनका इलाज किया जा रहा था. ‘नौकर की कमीज’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘एक चुप्पी जगह’ जैसे उपन्यासों के रचयिता विनोद कुमार शुक्ल को 59 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. 21 नवंबर को शुक्ल को उनके रायपुर स्थित निवास पर आयोजित एक समारोह में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था.

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