रायपुर। भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री एवं छत्तीसगढ़ राज्य संयुक्त पेंशनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव ने पेंशनरों की दुर्दशा और पीड़ादायक स्थिति के लिये राज्य में सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष दोनों को समान रूप से जिम्मेदार ठहराया है। दोनो ही राजनीतिक दल सत्ता में काबिज रहने अथवा विपक्ष में रहने के दौरान उन्होंने कभी भी पेंशनरों की 20 वर्षो से लंबित राज्य पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49 हटाकर पेंशनरी दायित्व का निपटारा करने और भोपाल स्थित सेन्ट्रल पेंशन प्रोसेसिंग सेल स्टेट बैंक की स्थापना रायपुर में किये जाने सम्बन्धी मामलों को सुलझाने में आज तक रुचि नही ली है, इसका खामियाजा जीवन के अंतिम पड़ाव में जीवन यापन कर रहे छत्तीसगढ़ के पेंशनर और परिवारिक पेंशनर लोग भोगने को मजबूर हैं, परन्तु सरकार और विपक्ष दोनो ही जानबूझकर इस समस्या के निराकरण के दिशा में आँख बंद कर अंधे होने का नाटक कर रहे हैं,दोनो ही राज्य सरकारें एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण कर आर्थिक रूप से पेंशनर को लगातार परेशान कर 5त्नमहंगाई राहत तथा छटवें और सातवें वेतनमान के एरियर राशि का भुगतान करने में बहाने बाजी कर रहे हैं। सत्ता में रहने के दौरान न तो भाजपा सरकार ने रुचि ली और अब सत्तारुढ़ कांग्रेस सरकार भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। उल्लेखनीय है कि धारा 49 को हटाकर पेंशनरी दायित्व का बंटवारा आपस मे नही होने के कारण नियमो के तहत 74 प्रतिशत राशि का भुगतान मध्यप्रदेश सरकार को और 26 प्रतिशत राशि का भुगतान छत्तीसगढ़ सरकार को मध्यप्रदेश के 05 लाख और छत्तीसगढ़ के 01लाख पेंशनरों इसतरह कुल 6 लाख से अधिक पेंशनर और परिवारिक पेंशनरों मिलकर करना होता है इसके लिए दोनो राज्य सरकारों में आपसी सहमति नही होने पर कोई भी भुगतान करना सम्भव नही हैं। इसी तरह सेन्ट्रल पेंशन प्रॉसेसिंग सेल के स्टेट बैंक गोविदपुरा भोपाल में दोनो ही राज्य के पेंशन प्रकरणों का अंतिम निराकरण करने का काम होता हैं और एक अकेले शाखा में दोनो राज्यों के काम निपटाने में अनावश्यक देरी होना स्वाभाविक है,इसलिए छत्तीसगढ़ राज्य में पृथक सेल की स्थापना की बहुत जरूरत है। ज्ञात हो कि छत्तीसगढ़ के साथ साथ उत्तराखंड और झारखंड राज्यों का निर्माण भी सन 2000 में ही हुआ था दोनो ही राज्य सरकारों ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49 और सेन्ट्रल पेंशन प्रोसेसिंग सेल की समस्या से वर्षो पूर्व निजात पा ली हैं और अपने राज्य के पेंशनरों के बारे में अकेले निर्णय लेने में सक्षम है, परन्तु छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश आपसी मनमुटाव के चलते अपने खुन्नस में पेंशनरों के साथ खिलवाड़ करने में मस्त है और 20 वर्षो से लंबित इस दोनो मामले को जानबूझकर टाल रहे हैं।

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