अवधेश कुमार। पश्चिम बंगाल का राजनीतिक तापमान चरम बिंदु पर पहुंचता दिख रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता स्थित राजनीतिक परामर्श से जुड़ी फर्म आइपैक के दफ्तर में मनी लांड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के छापे को मुद्दा बनाकर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। ममता का कहना है कि भाजपा ईडी के जरिये तृणमूल कांग्रेस के आइटी प्रमुख के घर पर छापा डालकर पार्टी का आंतरिक डाटा जब्त करने का प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में हाल में गृहमंत्री अमित शाह का तीन दिवसीय बंगाल दौरा भाजपा के लिए चुनावी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

उन्होंने पत्रकार वार्ता के माध्यम से पार्टी के मुद्दे स्पष्ट किए, सांसदों, विधायकों और प्रमुख नेताओं के साथ बैठक की तथा कार्यकर्ताओं से संवाद किया। अमित शाह ने प्रधानमंत्री मोदी की तरह बंगाल में भी सरकार बनाने का संदेश देते हुए कहा कि भय, भ्रष्टाचार, कुशासन और घुसपैठ की राजनीति के स्थान पर विकास, विरासत और गरीब कल्याण की मजबूत सरकार बनाने का संकल्प बंगाल की जनता में दिखाई देता है।

कांग्रेस की शुरुआत बंगाल से हुई थी, लेकिन आज वहां वह शून्य पर है और 34 वर्षों तक शासन करने वाला वाममोर्चा भी पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सका। इसके विपरीत भाजपा 41 प्रतिशत मतों और 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भले ही 2019 की तुलना में भाजपा की सीटें घटी हों, लेकिन 39 प्रतिशत मत और 12 सीटें यह दर्शाती हैं कि तृणमूल कांग्रेस के समानांतर उसका एक ठोस जनाधार विकसित हो चुका है। ऐसे में यदि भाजपा इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने का दावा कर रही है तो उसे केवल अतिशयोक्ति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि 2021 में भी भाजपा इसी तरह आत्मविश्वास के साथ चुनाव लड़ी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस से काफी पीछे रह गई थी।

बंगाल में 2021 के मुकाबले आज राजनीतिक माहौल काफी बदल चुका है। पड़ोसी देश बांग्लादेश की घटनाओं का प्रभाव पूरे देश पर पड़ा है। सीमावर्ती राज्य होने के कारण बंगाल पर असर और अधिक है। बंगाल में लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता तथा भाजपा-विरोधी वामपंथी सोच रखने वाले मतदाताओं का बड़ा वर्ग तृणमूल कांग्रेस की शक्ति रहा है। सामान्यतः माना जाता है कि या तो मुस्लिम मतों में गहरा विभाजन हो या हिंदू मतों का व्यापक ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हो, तभी वहां सत्ता परिवर्तन संभव है। सरकार के विरुद्ध आक्रामक रुख अपनाने वाली तृणमूल बांग्लादेश में विशेषकर हिंदुओं के विरुद्ध हुई हिंसा पर न तो तीखे बयान दे रही है और न ही कोई बड़ा विरोध-प्रदर्शन कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में बंगाल के बाहर पकड़े गए घुसपैठियों के पास 24 परगना क्षेत्र के आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र मिलने से प्रमाणित हुआ है कि वाममोर्चा और फिर ममता सरकार के दौरान बांग्लादेश से घुसपैठ हुई है।

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के दौरान भी कई घुसपैठिये यह कहते पाए गए कि वे लंबे समय से यहां रह रहे हैं और उनके पास पहचान पत्र हैं। उन्होंने मतदान करने की बात भी स्वीकार की। यह स्थिति 2021 में नहीं थी। इसके बावजूद ममता बनर्जी का इस तथ्य से इन्कार करना और गृह मंत्री अमित शाह से यह प्रश्न करना कि पहलगाम में हुआ आतंकी हमला क्या आपने करवाया, केवल भाजपा के कट्टर विरोधियों को ही स्वीकार्य हो सकता है। सब जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से जुड़ी है और पहलगाम हमला उसी का हिस्सा था।

बंगाल की सीमा पर सख्त घेराबंदी कर घुसपैठ को रोका जा सकता है। अमित शाह ने भी कहा है कि ऐसी घेराबंदी की जाएगी कि एक भी घुसपैठिया प्रवेश न कर सके। मुस्लिम मतों को एकजुट रखने के प्रयास में ममता वही कदम उठाती दिख रही हैं, जिनका वे वामपंथी शासन के दौरान विरोध करती रही थीं। बांग्लादेश में गैर-मुस्लिमों, विशेषकर हिंदुओं के विरुद्ध हुई हिंसा और बढ़ते कट्टरवाद ने हिंदू मतदाताओं को नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है। इसी पृष्ठभूमि में मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद की नींव रखने और वहां हर शुक्रवार को बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने, साथ ही भारी धनराशि के प्रवाह ने भी हिंदू मतदाताओं में पुनर्विचार की भावना को जन्म दिया है।

पिछले विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी ने स्वयं को निष्ठावान हिंदू दिखाने के लिए मंच से चंडी-पाठ किया था। इस बार भी चुनाव से पहले दुर्गा आंगन और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर निर्माण की घोषणा के संकेत दिए गए हैं। इससे प्रतीत होता है कि बदले हुए राजनीतिक माहौल का आभास ममता बनर्जी को हो चुका है और हिंदू मतों के बड़े पैमाने पर भाजपा की ओर जाने से रोकने के लिए वे आंशिक ध्रुवीकरण की रणनीति अपना रही हैं। ममता सरकार के दौरान सामने आए सत्तापोषित भ्रष्टाचार के मामले, विरोधियों का दमन, आरजी कर मेडिकल कालेज से लेकर संदेशखाली तक महिलाओं के शोषण के आरोप, मुस्लिम कट्टरवाद को बढ़ावा, बेरोजगारी, पलायन और विकास की धीमी गति जैसे मुद्दे तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जा रहे हैं। इस कारण इस बार भाजपा उसे कड़ी टक्कर देने की स्थिति में दिख रही है।

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