सर्वोच्च अदालत ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आईना दिखा दिया और उन्हें संविधान तथा संघीयवाद के मायने भी समझा दिए। कोलकाता में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी के दौरान जिस तरह मुख्यमंत्री ने दखल दिया और कुछ सबूत, दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उठा कर चल दीं, सर्वोच्च अदालत ने उसे ‘गंभीर मामला’ माना है और सुनवाई की बात कही है। ऐसे हस्तक्षेप को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ भी करार दिया गया है। ममता बनर्जी की पैरोकारी कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी सरीखे प्रख्यात वकील कर रहे हैं। दोनों राज्यसभा सांसद भी हैं। ईडी की छापेमारी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सबूतों से छेड़छाड़ करने की कोशिश पर दोनों वकीलों के जो भी तर्क रहे, उनसे सर्वोच्च अदालत की न्यायिक पीठ सहमत और संतुष्ट नहीं थी। सर्वोच्च अदालत ने मुख्यमंत्री, राज्य के पुलिस महानिदेशक और कोलकाता के पुलिस आयुक्त को नोटिस भेज कर जो जवाब मांगे हैं, वे जवाब मुश्किल हैं और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को बेनकाब कर सकते हैं। ममता चुनाव से पहले ऐसी पर्दाफाशी के पक्ष में नहीं होंगी! फिर भी दो सप्ताह की अवधि में नोटिसों के जवाब तो देने ही पड़ेंगे। वैसे पश्चिम बंगाल में यह मामला ‘राष्ट्रपति शासन’ चस्पा करने का बनता है, क्योंकि कई स्तरों पर ‘संवैधानिक ब्रेकडाउन’ हुआ है। यह मामला कोलकाता उच्च न्यायालय में भी था, लेकिन जिस तरह एक अनपेक्षित भीड़ ने अदालत-कक्ष में हंगामा किया था, उसके मद्देनजर न्यायाधीश मामले की सुनवाई ही नहीं कर सके। क्या यह ‘संवैधानिक ब्रेकडाउन’ की स्थिति नहीं थी कि उच्च न्यायालय में न्यायाधीश को भीड़ की अराजकता, शोर के कारण अदालत की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही स्थगित करनी पड़ी? क्या यह संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग नहीं है कि ईडी एक निजी कंपनी के आवास, दफ्तर पर छापे मारे और राज्य की मुख्यमंत्री वहां धमक कर, दखल देकर, साक्ष्यों को छीन कर ले जाए? बेशक वह मुख्यमंत्री का अमर्यादित, अभूतपूर्व और असंवैधानिक व्यवहार था।
पुलिस महानिदेशक और कोलकाता पुलिस आयुक्त समेत कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी मुख्यमंत्री के साथ हस्तक्षेप में योगदान दिया। क्या जेड प्लस सुरक्षा वाले व्यक्ति की सुरक्षा में ये शीर्ष अधिकारी भी साथ-साथ चलते हैं? अदालत में ये दलीलें खोखली साबित हुईं, क्योंकि सुरक्षा में कमांडो और सामान्य पुलिस बल ही नेता की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। सर्वोच्च अदालत ने ईडी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को भी मुख्यमंत्री का ‘एकाधिकारवादी रवैया’ माना और तत्काल प्रभाव से प्राथमिकी पर रोक लगा दी। यह पूरा घटनाक्रम और परिदृश्य साबित करता है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था गायब है और संविधान का मजाक उड़ाया जा रहा है। यह केंद्र बनाम राज्य के टकराव का मामला भी बनता है, क्योंकि केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई और जांच में राज्य सरकार रोड़े अटकाती रही है। बल्कि केंद्रीय एजेंसियों के प्रतिनिधियों पर शारीरिक हमले तक कराए जाते रहे हैं। अफसरों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है। जांच पूर्वाग्रही है अथवा केंद्र सरकार का दुरुपयोग है, ये शाश्वत आरोप हैं। इनके आधार पर किसी भी छापेमारी या जांच में मुख्यमंत्री या पुलिस दखल नहीं दे सकते। ईडी और सीबीआई तब भी थीं, जब केंद्र में भाजपा-एनडीए सरकार नहीं थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शासन में भी ऐसी स्थानीय एजेंसियां हैं। क्या संपूर्ण व्यवस्था ही दुराग्रही होकर काम करती है? आपत्ति और आरोपों के मद्देनजर कोई भी अदालत में चुनौती दे सकता है। ममता ने जो किया अथवा कराया है, क्या वह ‘संवैधानिक ब्रेकडाउन’ का मामला नहीं था? दरअसल केंद्र सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा कर ममता बनर्जी की ‘राजनीतिक शहादत’ सुनिश्चित करने के पक्ष में नहीं रही है। ऐसी कार्रवाई से ममता की पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ को चुनावों में फायदा मिल सकता है। बहरहाल अब तो मामला सर्वोच्च अदालत में है। अगली तारीख 3 फरवरी है। ईडी ने गुहार लगाई है कि ममता बनर्जी और दोषी पुलिस अधिकारियों को ऐसी सजा दी जाए, जो मिसाल बन जाए। अदालत के फैसले पर देश की निगाहें लगी रहेंगी।

