इस बार गणतंत्र दिवस के अगले ही दिन 27 जनवरी ‘ऐतिहासिक’ साबित हो सकती है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच ‘मुक्त व्यापार समझौते’ (एफटीए) पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। यूरोपीय संघ आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर ने इसके स्पष्ट संकेत देते हुए इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ करार दिया है। यह कथन स्वाभाविक भी है। भारत 147 करोड़ से अधिक की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक के आकलन हैं कि 2026-27 में भी भारत की अर्थव्यवस्था, करीब 6.5 फीसदी की विकास दर के साथ, सबसे तेज गति वाली होगी। आईएमएफ की उप प्रबंध निदेशक रह चुकीं गीता गोपीनाथ का आकलन है कि 2028 में ही भारत तीसरे स्थान की अर्थव्यवस्था बन सकता है। ऐसे देश के साथ व्यापार समझौता करने से यूरोपीय देशों को एक व्यापक, विविध बाजार मिलेगा। यूरोप के 27 देश, 22.5 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी, करीब 46 करोड़ आबादी, करीब 49,000 डॉलर की औसतन प्रति व्यक्ति आय वाले देशों के संघ के साथ भारत का एफटीए, यकीनन, पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाला संदेश लाएगा। यह समझौता 193 करोड़ से अधिक की आबादी के लिए बेहद अहम होगा। नए व्यापारिक आयाम खुलेंगे, उत्पादों की मांग बढ़ेगी, उत्पादन में बढ़ोतरी होगी, नतीजतन नए रोजगार भी पैदा होंगे। गौरतलब यह है कि 19 साल से दोनों के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत के कई दौर जारी रहे। तब इसे ‘ब्रॉड बेस्ड टे्रड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट’ (बीटीआईए) नाम दिया गया था, लेकिन 2007-13 के बीच संवाद के कई दौरों के बावजूद व्यापार समझौता सहमतियों तक पहुंच नहीं पाया। यूरोपीय संघ बाजार तक पहुंच, टैक्स, बौद्धिक अधिकार एवं संपदा, श्रम कानून-नियम, पर्यावरण मानकों सरीखे मुद्दों पर सहमत नहीं होता था।

कार्बन फुटप्रिंट को लेकर आज भी यूरोप के सवाल यथावत हैं। हालांकि भारत ने वैकल्पिक प्रयासों से कार्बन उत्सर्जन को लगभग शून्य करने के लिए ईमानदार उपक्रम भी किए हैं। मसलन-वनों के विस्तार, स्वच्छ ऊर्जा आदि। जाहिर है कि यूरोपीय संघ ने पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर भारत की गंभीरता को समझा होगा। बहरहाल यह समझौता सालों तक टलता रहा, लटकता रहा, अंतत: 2022 में नई राजनीतिक इच्छा के साथ एक व्यापक एफटीए को पूरा करने पर बातचीत शुरू हुई। वित्त वर्ष 2024-25 में यूरोपीय संघ को भारत का निर्यात 75.85 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 60.68 अरब डॉलर का किया गया। फिर भी यूरोप को भारत का निर्यात, चीन की तुलना में, कई गुना कम है। अब यूरोपीय संघ, भारत के लिए, सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन सकता है। भारत से भेजे गए कपड़े, रेडीमेड वस्त्र, चमड़े के सामान, समुद्री उत्पाद आदि पर अभी 2-12 फीसदी टैक्स लगता है। दवाएं, खासकर जेनेरिक दवाएं, रसायन के संदर्भ में, एफटीए के बाद, मंजूरी प्रक्रिया, कर और अन्य मानक अपेक्षाकृत आसान होंगे। जाहिर है कि उत्पाद सस्ते पड़ेंगे, लिहाजा यूरोपीय बाजार में ज्यादा बिकेंगे। एफटीए से भारत को यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ से छूट मिलेगी। हालांकि दोनों पक्षों का लक्ष्य है कि 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को ‘शून्य’ तक लाया जाए। इस्पात और एल्यूमीनियम का उत्पादन करने वाले भारत के लिए यह कर पाना वाकई एक बड़ी चुनौती है। फिलहाल यूरोपीय वाइन और स्पिरिट्स पर 150-200 फीसदी तक टैक्स लगता है। यूरोप से प्रीमियम और लग्जरी कारों पर भी 100-125 फीसदी तक आयात शुल्क लगता है। यदि एफटीए हो जाता है, तो यूरोप से औद्योगिक मशीनें, बिजली का सामान, रसायन के अलावा आईटी, इंजीनियरिंग, बिजनेस सर्विसेज, टेलीकॉम सरीखे सेवा क्षेत्रों को भी फायदा मिलेगा। इसके साथ ही विमानों के पुर्जे, हीरे, लग्जरी सामान के लिए भारत में नए अवसर बन सकते हैं। यूरोपीय लग्जरी कारें भारत में सस्ती मिल सकती हैं।

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