रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन अभिनव नीरव मंडल के प्रथम सत्र में विचारोत्तेजक संवाद और सारगर्भित विमर्श हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में आईं वरिष्ठ पत्रकार रुबिका लियाकत एवं छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा के मध्य रोचक परिचर्चा सम्पन्न हुई।
अपने संबोधन में सुश्री लियाकत ने राष्ट्रवाद पर संबोधित कहा कि जब हम मिट्टी में मिल रहे हों, तो यह मिट्टी भी रोए इस धरती की। उन्होंने पत्रकारिता के 18 वर्षों के अनुभव साझा करते हुए युवाओं को आगाह किया कि सोशल मीडिया पर आए 30 सेकंड के वीडियो पर आँख मूँदकर भरोसा न करें, बल्कि तथ्यों की स्वयं पड़ताल करें। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे किसी व्यक्ति या विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि सत्य और अच्छाई के लिए कार्य करती हैं और उनकी प्रतिबद्धता भारत के प्रति है।
इतिहास और सामाजिक समरसता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी के दंगों के समय किए गए मानवीय कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा स्वभावतः सेक्युलर है और भारतीयता उसी समझ से विकसित होती है। निजी प्रसंग साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी दादी सनातन परंपराओं का पालन भी करती थीं, पाँच वक्त नमाज़ भी पढ़ती थीं और सबका आदर करती थीं, यह भारत की साझा संस्कृति का उदाहरण है।
विराट हिंदू सम्मेलन से जुड़े अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें धर्म पर मन से विचार रखने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि वे स्वयं कलमा पढ़ती हैं, उनके तीनों बच्चे कुरान पढ़ते हैं पर वे अपने बच्चों को इस प्रकार तैयार कर रही हैं कि वे वंदे मातरम् और भारत माता की जय कहने में संकोच न करें क्योंकि उनकी पहचान भारतीय होने से है।
व प्रश्नोत्तर सत्र में पत्रकार बनने की आकांक्षा रखने वाली पत्रकारिता की छात्रा के प्रश्न पर उन्होंने परिश्रम, सत्यनिष्ठा और निर्भीकता को सफलता की कुंजी बताया। धर्म और राष्ट्रवाद से जुड़े प्रश्नों पर उन्होंने कहा कि किसी भी ग्रंथ या विचार को गुरु से समझना चाहिए, संदर्भ जानना चाहिए, और किसी की बातों में बहकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए क्योंकि एक ही बात के कई अर्थ हो सकते हैं। राष्ट्रवाद के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैं हमेशा भारत और राष्ट्रवाद को चुनूँगी।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने दो पुस्तकों का विमोचन किया, जिसमें जनसम्पर्क विभाग द्वारा प्रकाशित छत्तीसगढ़ के साहित्य पुरोधा एवं पूजा अग्रवाल की काव्य संग्रह ‘अम्मा की चाय’ शामिल थे। सत्र में बड़ी संख्या में युवा, साहित्यप्रेमी और पत्रकारिता से जुड़े लोग शामिल हुए।

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