राजस्थान , जोधपुर की प्रसिद्ध कथा वाचक साध्वी प्रेम बाईसा की संदिग्ध मौत के मामले ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जोधपुर के पुलिस कमिश्नर ने जांच के लिए एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया है. यह एसआईटी तीन सदस्यों की होगी, जिसकी अगुवाई एसीपी छवि शर्मा कर रही हैं.

टीम में एसीपी छवि शर्मा के साथ बोरनाडा थाने के इंचार्ज शकील अहमद को शामिल किया गया है. इसके अलावा जांच को वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर मजबूत करने के लिए एक फॉरेंसिक एक्सपर्ट को भी एसआईटी का हिस्सा बनाया गया है. अब साध्वी प्रेम बाईसा की मौत से जुड़े हर पहलू की जांच यही एसआईटी करेगी. पुलिस का कहना है कि मामले की निष्पक्ष और गहराई से जांच की जाएगी और जो भी तथ्य सामने आएंगे. उनके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.

महज 12 साल की उम्र में अपना लिया था अध्यात्म

राजस्थान की प्रसिद्ध कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा का कल (30 जनवरी 2026) उनके पैतृक गांव परेऊ (जिला बालोतरा) में पूरे विधि-विधान के साथ समाधि संस्कार किया गया. साध्वी के निधन से गांव में शोक और श्रद्धा का माहौल है. वे मात्र 12 साल की उम्र से धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर चल रही थीं, लेकिन 25 साल की उम्र में उनका असामयिक निधन हो गया. दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, संत-महात्मा और ग्रामीण उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे.

पोस्टमार्टम के बाद परिजन को सौंपा गया सैंपल

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साध्वी प्रेम बाईसा मंगलवार (27 जनवरी) को अजमेर से कथा पूरी करके जोधपुर के आरती नगर आश्रम लौटी थीं. लौटने के बाद उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी. कंपाउंडर ने तत्काल उन्हें इंजेक्शन लगाया, लेकिन तबीयत ज्यादा बिगड़ने के कारण उन्हें पाल रोड के एक निजी अस्पताल ले जाया गया. जहां उनकी मृत्यु हो गई.

परिजनों की अनुमति से पुलिस ने पोस्टमार्टम करवाया और विसरा सैंपल जांच के लिए भेजे. प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंपा गया. बुधवार (28 जनवरी) को जोधपुर से उनका पार्थिव शरीर परेऊ लाया गया और शुक्रवार (30 जनवरी) को समाधि संस्कार संपन्न हुआ.

मां के निधन के बाद आश्रम में रह रही थी प्रेम बाईसा

स्थानीय लोगों के अनुसार साध्वी प्रेम बाईसा का जीवन भक्ति, साधना और संघर्ष से भरा रहा. वे पांच साल की उम्र में मां के निधन के बाद जोधपुर के आश्रम में रहने लगीं. संतों के मार्गदर्शन में उन्होंने कथा वाचन और भजन गायन में विशेष पहचान बनाई और 12 साल की उम्र में पहली कथा करने के बाद उनकी ख्याति बढ़ती चली गई.

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