ट्रम्प की ‘बाडी-लैंग्वेज’ से तो नहीं लगता कि उन्हें युद्ध के भयानक परिणामों का ज्ञान हो। यह तो ठीक है कि अमरीका की ‘राजनीतिक- दादागिरी’ सब देशों पर भारी है लेकिन विश्व के राजनेता उन देशों की लिस्ट तो निकाल कर पढ़ें जिन्हें अमरीका की दादागिरी ने तबाह कर दिया। अमरीका की विस्तारवादी राजनीति आज दुनिया को तृतीय विश्व युद्ध की ओर धकेल रही है। वेनेजुएला, जो एक ‘प्रभुसत्ता-सम्पन्न’ राष्ट्र है, उसके राष्ट्रपति और उनकी धर्मपत्नी को हाथों-पैरों में बेडिय़ां डाल कर अमरीका की खतरनाक जेल में बंद कर देना, एक घृणित दादागिरी है।  भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ इसलिए लगाया कि भारत अपनी तेल आपूर्ति के लिए, रूस से पैट्रोल-डीजल खरीद रहा है। एक अन्य देश ‘ग्रीनलैंड’ पर इसलिए अमरीका अपना कब्जा जमाना चाहता है क्योंकि ‘ग्रीनलैंड’ की सीमा अमरीका से लगती है। तेल की खातिर ईरान में आग लगा रखी है। आज तक 2500 लोग ईरान के इन दंगों में अपनी जान गंवा चुके  हैं। अमरीका ईरान में उपद्रवियों की पीठ थपथपा रहा है। 

डोनाल्ड  ट्रम्प का ताली बजाना, दोनों मुट्ठियों को बंद कर हवा में लहराना यही इंगित करता है कि आज दुनिया में कोई अमरीका का मुकाबला नहीं कर सकता। अमरीका थानेदार है और दुनिया को उसका हुक्म मानना ही होगा। जो नहीं मानेगा, उस देश का हाल ‘वेनेजुएला’ जैसा होगा। अमरीका ने अपनी तेल की भूख मिटाने के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध में घी डाल रखा है। दुनिया सुन रही है कि ट्रम्प ‘रूस-यूक्रेन’ युद्ध को समाप्त करने के लिए ‘मध्यस्थ’ की भूमिका निभा रहे हैं लेकिन ट्रम्प ‘रूस-यूक्रेन’ युद्ध को समाप्त क्यों करवाएंगे? ट्रम्प भारत के विरुद्ध बंगलादेश और पाकिस्तान की पीठ थपथपा रहे हैं। पाकिस्तान के ‘फील्ड-मार्शल’ मुनीर को राष्ट्रपति भवन में रात्रि भोज दे रहे हैं। तीनों देशों-भारत बंगलादेश और पाकिस्तान को एक-दूसरे से लड़ाने की योजना बना रहे हैं। यहीं बस नहीं, अमरीका ने झूठे आरोप लगा कर कि ईराक ने ‘रासायनिक-औजार’ छिपा रखे हैं, ईराक के लोकप्रिय नेता निरपराध सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटका दिया था। लिबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी को सन्देहास्पद परिस्थितियों में मार दिया गया। अमरीका ने सोमालिया, सीरिया, फिलिस्तीन में ‘गाजा-पट्टी’ क्षेत्र को कब्रगाह बना दिया। इसराईल और हिजबुल्ला से सन्धि ही नहीं होने दी। 

पाठकवृंद, क्या आप जानते हैं कि 2025-26 में अमरीका का ‘रक्षा-बजट’ 895 अरब डालर है जिसके बल पर अमरीका ‘मेमने’ की तरह कभी भी किसी भी देश को झूठे इल्जाम लगा कर हड़प सकता है? अमरीका ने वियतनाम से लड़ाई लड़ी, अफगानिस्तान में वर्षों तालिबानों से युद्ध किया परन्तु दोनों देशों में उसकी शर्मनाक हार हुई। शायद अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प युद्ध के परिणाम नहीं जानते होंगे। उन्होंने किसी युद्ध का सामना किया होता तो यकीनन संभावित ‘तृतीय विश्व युद्ध’ से तौबा कर लेते। युद्ध तो स्वयं एक समस्या है, वह समस्याओं को कैसे हल करेगा। युद्ध अपने पीछे तबाही के मंजर छोड़ जाता है। नौजवान सैनिक युद्ध में मारे जाते हैं। पीछे रह जाती हैं उनकी बेसहारा विधवाएं, बूढ़े, निरीह प्राणी और बिलखते बच्चे। विश्व युद्धों के बाद भयानक परिणाम होते हैं, जैसे बड़े पैमाने पर जन हानि, शारीरिक-क्षति, अर्थ-व्यवस्था का पतन, राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक बदलाव, महिलाओं का हृदय-विदारक रूदन-क्रंदन, बच्चों की चीखो-पुकार, शरणार्थियों को बसाने की समस्या। 

साम्राज्य टूट जाते हैं, जैसे आटोमन और ऑस्ट्रो-हंगेरियन लापता हो गए, नए देश बनने लगते हैं, सीमाएं बदल जाती हैं जैसे पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया की सरहदें बदल गईं। लोकतन्त्र एकात्मक शासन प्रणालियों में बदल गए। मनुष्य जिस स्थान पर नौकरी करता था अब उसकी विधवा काम कर रही है। युद्धों के बाद कई नए राजनीतिक विवाद पैदा हो जाते हैं। नए-नए युद्ध विस्फोटक तैयार किए जाने लगे। परमाणु बम इसी विश्व युद्ध का परिणाम था। हिरोशिमा और नागासाकी (जापान) अमरीकी परमाणु बम से तबाह हो गए। जापान ने आत्म-समर्पण कर दिया। विश्व युद्ध समाज को गहराई तक तोड़ देते हैं। मनुष्य आत्मिक तौर पर दुनिया में अमन-चैन चाहता है। युद्ध मनुष्य में पाश्विक-वृत्तियों को जन्म देते हैं। इसलिए विश्व युद्ध जितना हो सके, टलते रहना चाहिए। महाभारत के युद्ध के पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर को इतनी ग्लानि हुई कि उन्हें राजसत्ता से ही वितृष्णा हो गई। ट्रम्प को विश्व राजनेता समझाएं कि युद्ध टलता ही रहे तो ठीक, अन्यथा मानवता खतरे में पड़ जाएगी।-मा. मोहन लाल 

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