प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा में ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पर अपना जवाब नहीं दे सके। राष्ट्रपति अभिभाषण के संदर्भ में प्रधानमंत्री अपनी बात सदन में नहीं रख सके, जबकि वह सदन के नेता भी हैं। संसदीय इतिहास में यह अभूतपूर्व विडंबना है और देश की संसदीय व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। चूंकि स्पीकर ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की कथित किताब के अंश सदन में पढऩे की अनुमति नहीं दी, लिहाजा विपक्ष उबल रहा है। विरोध और गुस्से में, सदन में ही, पोस्टर-बैनर लहराए जा रहे हैं। यह कानून और संविधान का उल्लंघन है। कुछ नारे भी आपत्तिजनक हैं। संसद में हंगामा हो रहा है। क्या यही ‘न्यू नॉर्मल’ है? कमोबेश हंगामे के आसार की सूचना गृहमंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री मोदी को दी होगी! गृहमंत्री और संसदीय कार्य मंत्री ने विपक्ष के नेताओं से भी बातचीत की, लेकिन कोई बर्फ नहीं पिघली। स्पीकर ओम बिरला ने अपने चैंबर में भी पक्ष और विपक्ष के नेताओं की बैठक बुलाई थी, लेकिन वहां भी उग्र और उत्तेजित संवाद हुआ, नतीजतन हंगामा जारी रहा। हमने संसदीय कवरेज के अपने अनुभव में देखा है कि जब प्रधानमंत्री बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो विपक्ष का हंगामा खामोश हो जाता है।
यह आचार-संहिता भी है, परंपरा भी है और प्रधानमंत्री पद के प्रति सम्मान भी है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के कालखंड में सत्ता और विपक्ष प्रतिद्वंद्वी नहीं, एक-दूसरे के ‘कट्टर दुश्मन’ बन गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी को इससे पहले भी विपक्ष के हंगामे, शोर, नारेबाजी के बीच ही अपना भाषण देना पड़ा था। इस बार भी विपक्ष जबरदस्त विरोध पर आमादा है, क्योंकि नेता प्रतिपक्ष को बोलने नहीं दिया गया और विपक्ष के 8 सांसदों को सत्र भर के लिए निलंबित कर दिया गया है। जहां तक निलंबित सांसदों का सवाल है, हमारा मानना है कि ऐसे सांसदों की सांसदी ही बर्खास्त कर दी जाए। उसके लिए नियम-कानून में संशोधन किया जा सकता है। जिस तरह विपक्षी सांसदों ने ‘वेल’ में आकर कागज की चिन्दियां स्पीकर के आसन पर फेंकी थीं और मेजों पर चढ़ कर ‘हुड़दंगी नृत्य’ किया था, कमोबेश सदन में वह अक्षम्य होना चाहिए। पूर्व उपराष्ट्रपति एवं सभापति जगदीप धनखड़ के कार्यकाल में, राज्यसभा में भी, ऐसे हुड़दंग मचाए जा चुके हैं। वहां भी सांसद निलंबित किए गए थे। यदि विपक्ष की यही विरोध-शैली बन गई है, तो यकीनन यह अराजकता, मर्यादाओं का हनन, अनुशासनहीनता और सदन के अध्यक्ष का अपमान है। संसद ऐसे हुड़दंगियों का सदन नहीं बनाई जा सकती। दलीलें दी जाती रही हैं कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने भी ऐसे ही हंगामे मचाए थे, नतीजतन पूरे सत्र ही धुल गए थे। ऐसे अतीत आज प्रासंगिक नहीं हैं। हम संसद के भीतर ऐसे विरोध, हंगामे को न तो अभिव्यक्ति की आजादी मानते हैं और न ही विपक्ष का विशेषाधिकार मानने को तैयार हैं। लोकसभा में ही वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को भारत-अमरीका व्यापार समझौते पर, विपक्षी शोर के बीच ही, अपना वक्तव्य पढऩा पड़ा। ऐसी संसद का औचित्य क्या है? यह कोई अखाड़ा नहीं, भारत के लोकतंत्र का सर्वोच्च और गरिमापूर्ण मंदिर है, सर्वोच्च पंचायत भी है। संभवत: प्रधानमंत्री मोदी राज्यसभा में राष्ट्रपति अभिभाषण के संदर्भ में ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पर बोलेंगे। यदि उच्च सदन में भी विपक्ष की वही चिल्ल-पौं हुई, तो क्या होगा? यह आलेख लिखे जाने तक प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा में नहीं बोल पाए थे। अंतत: लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित कराना पड़ा। संसद के भीतर यह भी कर लो, क्योंकि एक घंटे में दसियों विधेयक, बिना चर्चा के, इसी सदन में पारित किए जाते रहे हैं। बहरहाल, संसद में जो हो रहा है, वह निरंकुशता और उच्छृंखलता है। क्या संसद इसीलिए बनी है?

