इस सप्ताह के अंत तक, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन, जो गणतंत्र दिवस परेड की मुख्य अतिथि थीं, संभवत: उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करेंगी, जिसे उन्होंने ‘ऐतिहासिक’ बताया है-भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता। ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहे जाने वाले इस मुक्त व्यापार समझौते का परिणाम 2 दशकों से रुकी हुई बातचीत के बाद सामने आया है। लेकिन क्या यह सफल होगा? या फिर (अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा यूरोप और भारत दोनों पर टैरिफ का हथियार रखने के कारण) जल्दबाजी में किए गए इस समझौते की संतान जन्मजात रूप से दोषपूर्ण है?

यूरोपीय संघ और भारत द्वारा पहली बार ‘रणनीतिक’ संबंध की घोषणा के 3 साल बाद, 2007 में मुक्त परमाणु समझौते (एफ.टी.ए.) की वार्ता शुरू हुई। उस समय भारत नहीं, बल्कि चीन यूरोपीय संघ का सबसे पसंदीदा सांझेदार था। इसके बाद 15 दौर की वार्ताओं से कुछ खास हासिल नहीं हुआ। यूरोप भारत के प्रति अपने एकतरफा रवैये पर अड़ा रहा। कृषि जैसे पहलुओं और यूरोपीय उत्पादों पर भारत द्वारा लगाए गए अत्यधिक शुल्क को लेकर वास्तविक चिंताएं थीं। भारत कार्बन उत्सर्जन कम क्यों नहीं करता, अपने औद्योगीकरण को क्यों नहीं रोकता और पश्चिमी देशों की मांगों को क्यों नहीं मानता? क्या भारतीय चुपके से यूरोपीय संघ के उच्च श्रम और पर्यावरण मानकों का उल्लंघन करेंगे?

भारत ने चीन के कहीं अधिक सकल घरेलू उत्पाद (2007 में भारत के 1.2 ट्रिलियन डॉलर की तुलना में लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर), तेजी से सस्ते सामान का उत्पादन और वितरण करने की उसकी क्षमता तथा उसके बढ़ते उपभोक्ता बाजार को नजरअंदाज कर दिया। चीन-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार और निवेश फलता-फूलता रहा लेकिन ब्रसेल्स में चीन के ‘गैर-लोकतांत्रिक’ स्वरूप और ‘मानवाधिकार’ रिकॉर्ड का शायद ही कभी जिक्र हुआ। 2013 तक, भारत-यूरोपीय संघ वार्ता अधर में लटक गई। हालात तब बदले, जब चीन से आर्थिक और भू-रणनीतिक खतरे का सामना कर रहे अमरीका ने ‘इंडो-पैसिफिक’ नामक एक नए महासागर की खोज की और उस देश को लुभाना शुरू किया जो इसके सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर प्रभुत्व रखता था-भारत। यूरोप ने भी इसका अनुसरण किया और भारत-यूरोपीय संघ एफ.टी.ए. पर बातचीत 2022 में फिर से शुरू हुई।

यूरोपीय लोग आमतौर पर अतिशयोक्ति नहीं करते, लेकिन पिछले सप्ताह दिल्ली में चिंतन फाऊंडेशन द्वारा आयोजित एक भरे हुए सैमीनार में, यूरोपीय संघ के 3 सबसे छोटे राज्यों-इटली, माल्टा और एस्टोनिया-के प्रतिनिधियों और भारतीय विश्लेषकों ने इस बात पर जोर दिया कि मुक्त व्यापार समझौता लगभग पूरा हो चुका है। हालांकि, समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। यूरोपीय संघ के लिए, भारत द्वारा शराब, स्पिरिट और डेयरी उत्पादों पर लगाए गए 150 प्रतिशत तक के उच्च टैरिफ एक समस्या है। भारत के लिए, यूरोपीय संघ के कड़े बौद्धिक संपदा अधिकार नियम उसके अपने अधिक लचीले पेटैंट कानूनों से टकराते हैं, जिनके कारण सस्ती जैनरिक दवाएं संभव हो पाती हैं। यूरोप खरीद प्रक्रियाओं तक अधिक पहुंच चाहता है लेकिन ‘आत्मनिर्भर भारत’ स्थानीय आपूर्तिकत्र्ताओं को प्राथमिकता देता है। इसके अलावा, यूरोप का कार्बन बॉर्डर एडजस्टैंंट मैकेनिज्म (सी.बी.ए.एम.) भी है, जिसे सस्ते, पर्यावरण के लिए हानिकारक उत्पादों को यूरोपीय संघ में प्रवेश करने से रोकने के लिए बनाया गया है। स्टील, एल्यूमीनियम, सीमैंट आदि पर लगाए गए भारी गैर-टैरिफ अवरोधों के कारण भारतीय लघु एवं मध्यम उद्यमों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।

शराब, स्पिरिट और डेयरी उत्पादों पर टैरिफ कम करने से घरेलू किसानों, स्थानीय शराब उद्योग और राज्य सरकार के राजस्व को खतरा होगा। यूरोपीय ऑटोमोबाइल पर टैरिफ कम करने से भारत में विनिर्माण क्षेत्र की नौकरियां खतरे में पड़ जाएंगी। यूरोपीय संघ के कृषि उत्पादों के लिए कड़े मानक (उदाहरण के लिए बासमती चावल पर कीटनाशकों की सीमा) और जटिल प्रमाणन प्रक्रियाएं भी अनुपालन के लिए कठिन होंगी। मानव संसाधन का सवाल भी है। यूरोप एक स्पष्ट एकीकृत आव्रजन नीति के बिना भारतीय नर्सों, तकनीशियनों, आई.टी. प्रतिभाओं आदि को लुभाने की कोशिश कर रहा है। भारत ऐसे कामगारों के लिए आसान वीजा प्रक्रिया और निर्बाध आवागमन चाहता है। अंतत:, यूरोपीय संघ की संरचना और उसकी जटिल प्रक्रियाएं एक बड़ी खामी हैं। ऑब्जर्वर रिसर्च फाऊंडेशन के अर्थशास्त्री संजीव आहलूवालिया बताते हैं कि जब तक सभी 28 यूरोपीय संघ के सदस्य देश इसकी पुष्टि नहीं कर देते, तब तक यह समझौता केवल कागजों पर ही रहेगा। लेकिन भारत के यूरोपीय संघ के अलग-अलग देशों के साथ संबंध भिन्न-भिन्न हैं। पुष्टि प्रक्रिया के दौरान इनमें टकराव हो सकता है। तो क्या भारत-यूरोपीय संघ के मुक्त व्यापार समझौते को दस्तावेज पर हस्ताक्षर होते ही एक सफल और आवश्यक विवाह का परिणाम घोषित किया जा सकता है? इसका जवाब जानने में कम से कम एक साल और लगेगा।-पद्मा राव सुन्दरजी     

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