मंडी शिवरात्रि महोत्सव के दौरान अराध्य देवी देवताओं की पूजा की जाएगी। महोत्सव के सात दिनों में दस देवी देवताओं की पूजा की जाएगी। छोटी काशी में रियासतकाल की परंपराओं और पूजा विधान को आज भी सहेजा जा रहा है। छोटी काशी मंडी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाला शिवरात्रि महोत्सव आस्था, परंपरा और इतिहास का सजीव संगम है। इस पावन महोत्सव के सात दिवसीय आयोजन में प्रतिदिन विभिन्न ऐतिहासिक एवं प्राचीन मंदिरों में पूजा की रियासत काल से परंपरा है। यह मंदिर तत्कालीन राजाओं के संरक्षण में निर्मित हुए और अपने गर्भ में सदियों पुराना इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए हंै। इन मंदिरों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली व प्राचीन है। इनमें शिवरात्रि महोत्सव के दौरान होने वाली विविध पूजा विधियां भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा से सरावोर करती हैं। शिवरात्रि महोत्सव के दौरान विभिन्न मंदिरों में रियासत काल में राजा स्वयं पूजा करते थे। अब इस प्रथा को प्रशासन द्वारा निभाया जाता है। सात दिनों तक आयोजित होने वाले इस उत्सव में प्रतिदिन अलग-अलग मंदिर में परम्परा अनुसार पूजा की जाती है।
शिवरात्रि महोत्सव के पहले दिन श्री राज माधोराय मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है। यह प्रथा 1632 में राजा सूरज सेन के समय से आरंभ हुई है। वर्तमान में शिवरात्रि महोत्सव समिति के अध्यक्ष के कर कमलों द्वारा उपायुक्त कार्यालय के परिसर में स्थित श्री राज माधोराय मंदिर में पूजा अर्चना की इस ऐतिहासिक प्रथा को निभाया जाता है।
दूसरे दिन श्री जगन्नाथ मंदिर में पूजा
सन् 1679 ई0 में मंडी के राजा गुरसेन श्री जगन्नाथ जी की मूर्ति उड़ीसा जगन्नाथ पुरी मंदिर से मंडी लाए थे। ऐसा कहा जाता है कि रियासत काल में मंडी के राजा हर वर्ष जगन्नाथ पुरी जाते थे। कुछ समय के बाद राजा ने भगवान से प्रार्थना कर पूरी आने में असमर्थता जताई। जिस पर श्री जगन्नाथ जी ने दृष्टांत दिया कि वह एक बार जगन्नाथ पुरी आए और वहां उनके विग्रह को अपने यहां ले जाकर स्थापित करें। राजा ने देव आदेश को माना और पुरी से विग्रह लाकर पड्डल में श्री जगन्नाथ जी को स्थापित कर वहां एक मंदिर का निर्माण किया। इसी के साथ शिवरात्रि महोत्सव के दूसरे दिन जगन्नाथ भगवान की पूजा की परम्परा जुड़ गई। पुराना मंदिर पत्थर और मिट्टी गार के स्लेटनुमा छत वाला पहाड़ी शैली के भवन में स्थापित था। 90 के दशक में यहां पर शिखर शैली के मंदिर का निर्माण किया गया।
तीसरे दिन की माता श्यामा काली टारना में पूजा
मंडी रियासत की पूर्व राजधानी भटोहली में उत्तराभिमुखी लघु मंदिर शक्ति का प्रतीक देवी काली को समर्पित है। इसे श्यामकली का मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि टारना माता का प्राचीन स्थान यहीं पर है । यह शक्ति का प्रतीक तारा देवी का स्थान है। रियासतकालीन भूमि के दस्तावेजों के अनुसार पहले यहां पर चार फुट चैड़ा और चार फुट लंबा लघु देवालय बना था। मंदिर का अब पुननिर्माण हो चुका है। गर्भगृह में पाशाण पर चतुर्भुज स्वरूप में देवी काली की प्रतिमा का उत्कीर्ण हुआ है। राजा श्यामा सैन ने सुकेत रियासत के राजा जीत सैन से लोहारा की लड़ाई जीतने के बाद टारना में श्यामा काली मंदिर का निर्माण किया था। शिवरात्रि महोत्सव के तीसरे दिन की पूजा मांश्यामा काली टारना को समर्पित है ।
चौथे दिन की श्री राम चंद्र, माता सीता व माता जालपा मंदिर में पूजा
महोत्सव के चौथे दिन श्री राम चंद्र, माता सीता जी व जालपा माता मंदिर में पूजा करने का ऐतिहासिक प्रचलन है। श्री राम चंद्र मंदिर का निर्माण राजा सूरज सैन ने 1637 से 1664 ई0 के मध्य में पड्डल मंडी में करवाया था जो भारत का एक दुर्लभ मंदिर है। आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण छोटी काशी मंडी में श्री रामचंद्र मंदिर करीब 300 साल पुराना है । मूर्ति शिल्प के आधार पर यह भगवान विष्णु का मंदिर है, परंतु देव आस्था का प्रतीक श्री राम चंद्र हंै। जीवन में मर्यादाओं की पराकाष्ठा स्थापित करने वाले कौशल्या नंदन श्री रामचंद्र यहां साक्षात नारायण स्वरूप में दर्शन देते हेैं। शिल्पा ने भगवान विष्णु के देव स्वरूप में उनके अवतार श्री राम चंद्र को मूर्ति में तराषा है। सदानीरा बिपाशा के तट पर प्राचीन मंदिर वास्तु श्री लक्ष्मी स्वरूप देवी जालपा को समर्पित है। दशम महाविद्या कमला श्री लक्ष्मी का यह मंदिर उत्तराभिमुखी है। यहां जालपा से आशय है जो जल से प्रकट हुआ है। मंदिर के ठीक नीचे अनेकों कल्पों से वेगवान बिपाशा कल-कल बहती है। जनश्रुतियों के अनुसार लोक देवी जालपा जलधारा से प्रकट हुई है। मूलत: यह प्रकृति की देवी है। यह विष्णु प्रिया धन, यश-वैभव की देवी लक्ष्मी का मंदिर है। मंदिर के गर्भगृह में पाशाण पट्ट पर श्री यंत्र स्थापित है।
पांचवीं पूजा सिद्धकाली, भुवनेष्वरी मंदिर में
शि वरात्रि महोत्सव के पांचवें दिन माता सिद्ध काली मंदिर संकन गार्डन में पूजा की परंपरा है। सिद्ध काली मंदिर की स्थापना राजा सिद्ध सेन ने की थी। इस मंदिर का इतिहास राज परिवार से जुड़ा हुआ है। चट्टान को रेती-छेनी से तराशते हुए परा प्रकृति सिद्व काली की अश्टभुंजा स्वरूप प्रतिमा का शिलपांकन अदभुत है। वहीं भुवनेष्वरी मंदिर नगर निगम कार्यालय के पास स्थित है।
छ_े दिन त्रिलोकीनाथ व शीतला माता मंदिर पुरानी मंडी मंदिर में पूजा
शिवरात्रि महोत्सव के छट्टे दिन पुरानी मंडी स्थित त्रिलोकनाथ व शीतला माता मंदिर में पूजा की जाती है। शिवरात्रि महोत्सव के दौरान इन मंदिरों में कालांतर से पूजा की जा रही है। वैदिक नदी बिपाशा के पावन तीर पर भगवान शिव को समर्पित प्राचीन त्रिलोकीनाथ मंदिर नगर वासियों की आस्था में गूंथा हुआ है। यह एक दर्शनीय धार्मिक वास्तु स्थल है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। शिखर शैली के मंदिर का निर्माण कलि संवत 2264 शक संवत 1442 में होने की जानकारी मिली है। यह मंदिर वास्तु उस समय बना जब मंडी रियासत की राजधानी भटोहली या वाशनी में हुआ करती थी। वाशनी अर्थात वास करने वाली जगह। बंगाल मूल के सेन राजपूत राजाओं की वंषावली से तत्कालीन राजा अजबर सेन की रानी सुल्ताना देवी ने मंदिर का निर्माण करवाया था। टांकरी अभिलेख मंदिर के पांच सौ साल पुराना होने की ओर स्पष्ट संकेत करता है। वहीं इस धारणा को भी मान्यता देता है कि उस काल में यहां पहाड़ में टांकरी लिपि प्रचलन में रही थी। इसी तरह माता शीतला की स्थापना भी राजा द्वारा की गई है। पुरानी मंडी में शिखर शैली का यह मंदिर नवम् महाविद्या देवी मातंगी शीतला देवी को समर्पित है। यह मंदिर काफी प्राचीन है, यद्यपि निर्माण तिथि के लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। वर्ष 1905 में कांगड़ा घाटी पर केंद्रित विनाशकारी भूकंप से मंडी के प्राचीन वास्तु स्थलों को भी काफी क्षति पहुंची थी । उस दौरान शितला माता मंदिर का उपरी हिस्सा भूकंप से गिर गया था, जिसकी मरम्मत की गई है।
सातवें दिन की पूजा श्री भूतनाथ मंदिर में
श्री भूतनाथ मंदिर की स्थापना के समय तक छोटा मेला 1527 ई. में भूतनाथ के प्रांगण में होता था। उस समय भूतनाथ के बाहर राजपरिवार के महल थे तथा वहीं पर मेला आयोजित होता था। बाद में इसका नाम चौहटा पड़ा। श्री बावा भूतनाथ मंदिर की स्थापना करने के बाद ही शिवरात्रि मेले का शुभारंभ हुआ, क्योंकि भूतनाथ की स्थापना के दिन शिवरात्रि थी और शिव पार्वती का मिलन हुआ था । इस मेले का महत्व भी राज परिवार से जुड़ा है और कालांतर से पूजा की परम्परा चलती आ रही हैं। बाबा भूतनाथ मंडी नगर के अधिष्ठाता देव हैं। नगर के बीचों-बीच बाबा भूतनाथ का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह करीब पांच सौ साल पुराना धार्मिक वास्तु है। मंडी नगर की स्थापना करने वाले बंगाल मूल के सेन राजपूत राजा अजबर सेन ने 1526-27 ई. में मंदिर बनवाया बाबा भूतनाथ शिवलिंग प्राकृतिक अवस्था में है यह मंदिर शिखर शैली में बना है।

