स्थापित मान्यता है कि- “भाषा केवल संवाद का साधन मात्र नहीं है, बल्कि संस्कृति, पहचान और सभ्यता’ का भी प्रतीक है।” इन्हीं सन्दर्भों में यूनिसेफ ने इस बार ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ का केन्द्रीय थीम बनाया है- “मातृभाषा आधार जहां, हर भाषा उपहार वहां!”
इसी थीम के तहत यूनिसेफ से सम्बद्ध कई देशों की जवाबदेह सरकारों द्वारा 21 फ़रवरी के दिन व्यापक कार्यक्रम किये जा रहे हैं।
भारत सरकार की ओर से इस महत्वपूर्ण दिवस पर क्या कुछ विशेष कार्यक्रम होने हैं, कुछ पता नहीं चला। ऐसे में कहीं कोई कार्यक्रम आयोजित हुए होंगे भी तो वे निजी स्तर के ही कहे जायेंगे। वैसे प्रायः सभी राज्यों में वहां की भाषा अकादमियां हैं, जिनके लिए ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ पर कार्यक्रम आयोजित करना उनका प्राथमिक दायित्व है। लेकिन वहाँ भी मानो यही परिदृश्य है- रोअहू सब मिलिके आवहु भारत भाई, हा हा! भारत-दुर्दशा ने देखि जाई।
“भक्त-दलील” दी जा सकती है कि “नयी शिक्षा नीति” में तो मातृभाषा पर समुचित ध्यान और सम्मान दिया गया है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर तो प्राथमिक शिक्षा में, जहां मातृभाषा में पठन-पाठन को अनिवार्य बनाए जाने को लेकर सुव्यवस्थित कार्ययोजना बनानी थी, उसकी जगह आब “AI” (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस- कृत्रिम बुद्धिमत्ता) को जबरन लादा जा रहा है। मासूम-अबोध बच्चों की सोच-समझ को मातृभाषा में शिक्षा के माध्यम से विकसित करने के अहम् काम को दरकिनार कर, सबों के निश्छल दिल-दिमाग में “AI” ठूंसने की कवायद युद्धस्तर पर की जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिन आदर्श उद्देश्यों के तहत ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ मनाने की तिथि और उसके सकल उद्देश्यों की स्थापना की है, आज सबसे अहम् हैं। क्योंकि दुनिया के साथ साथ भारत देश भी विविध भाषाओं और संस्कृतियों वाला एक राष्ट्र है। ऐसे में ‘बहु भाषा-संस्कृति की विशिष्ठता और उसकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति’ को स्थापित करना देशज के साथ साथ वैश्विक-बोध का कार्यभार बन जाता है। दुनिया के कई देश इस पर अमल करने की कोशिश करते रहे हैं, “विश्वगुरु भारत” के लिए मानो यह सब “फ़ानी” जैसा है।
उक्त सन्दर्भ विशेष में देखा जाय कि हिंदी समाज की “मुख्यधारा” में क्या स्थिति है, तो हालात बेहद निराशाजनक दीखते हैं। जिसके लिए आधुनिक हिंदी भाषा-साहित्य के जनक कहे जानेवाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र कि उक्ति आज पूरी तरह से सत्य साबित हो रही है। उन्होंने आगाह करते हुए लिखा था- “अंग्रेजी पढ़िके उन्नति सब गुन होत प्रवीन, पै निज भाषा ज्ञान बिन राहत हीन के हीन”। ये बातें उन्होंने मातृभाषा के महत्व देने के सन्दर्भ कही थी कि- “निजु भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा-ज्ञान के मिटै न हिय को शूल”।
वैसे, इस सन्दर्भ में एक भारी विडंबना यह भी है कि जिस हिंदी-पट्टी के क्षेत्र से कभी ‘साझी-संस्कृति’ की अविरल धारा ने ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ बनकर पूरे सामाजिक परिवेश के भाषा-ज्ञान पर इतना गहरा असर डाला था कि ‘हिंदी-उर्दू सगी बहनों’ की मान्यता स्थापित हुई थी, आज वहीं सारा का सारा इलाका “सत्ता-राजनीति संचालित उग्र धार्मिकता” का भयानक् अखाड़ा बन चुका है। चुनावी ध्रुवीकरण और “वोट” के लिए बात-बात में “हिन्दू-मुसलमान” करना अचूक अस्त्र बना लिया गया है।
सबसे बढ़कर, जहाँ से कभी ‘निज भाषा-ज्ञान की गंगा’ निकली थी, अब वहाँ उग्र सांप्रदायिक हिंसा-उन्माद और दकियानूस-कट्टर विचारों का “जहरीला परनाला” बहाया जा रहा है। इसी कवायद में हिंदी पट्टी समाज की बहुसंख्य आबादी को सारे संचार माध्यमों और “शिक्षाविद सेलीब्रिटीजों” द्वारा दिन-रत यही घुट्टी पिलाई जा रही है कि उनकी “दबंग पहचान” उग्र-धार्मिकता से ही संभव है। जिसमें ‘निज-भाषा और ज्ञान” वही होगा जो बाज़ार-संस्कृति निर्देशित होगी। जैसे, आज अमेरिका आयातीत “AI” की भाषा और ज्ञान सबसे अधिक ट्रेंड कराया जा रहा है, तो उसी को अपनाने की होड़ मचायी जा रही है।
रहा सवाल कि इस देश की “जेन ज़ी” पीढ़ी क्या करे? तो हालात यही है ये पीढ़ी जितना भी एडवांस और हाईटेक अथवा एआई एक्सपर्ट हो ले, भाषा-ज्ञान के संस्कारों के मामले में अंततोगत्वा “उग्र धार्मिकता” शरण में जाकर ही हर सक्सेस है। दूसरे, कैरियर-निर्माण का चक्कर भी ‘निज भाषा-ज्ञान’ की अपनी जड़ों से जुड़ने की मोहलत नहीं दे रहा है।
अब रहा मामला हिंदी पट्टी समाज के साहित्य की मुख्यधारा का, कि वहां ‘निज भाषा-ज्ञान’ के लिए क्या कुछ हो अथवा किया जा रहा है। तो यहाँ भी स्थिति बेहद प्रतिकूल और सभी स्तरों गिरावट वाली बनी हुई है। आधुनिक हिंदी और खड़ी-बोली की सृजन-भूमि कहे जानेवाली धरती के हर शय में मानो भगवा-भंग घोली जा चुकी है। जिसमें मातृभाषा-संस्कार जैसे पहलुओं को तो मानो कब का बाहर किया जा चुका है।
बताया जाता है कि खड़ी बोली वाली हिंदी का निर्माण अवधी व अन्य स्थानीय जनभाषा और बोलियों को लेकर हुआ था, आज उसी हिंदी में मातृभाषायें “अपने देश में परदेसी” जैसी दुरावस्था झेलने को अभिशप्त हैं। बिहार राज्य में प्रदेश की मातृभाषाओं के विकास के लिए तो कई विशेष अकादमियां बनी हुई है, जो पूरी तरह से खस्ताहाल हैं। विचित्रता तो यह है कि इन भाषाओँ के साहित्यकारों में से अधिकाँश की समझ और लेखन का स्तर “स्वान्तः सुखाय” की स्थिति से भी नीचे है। उस पर से आलम तो यह है कि ‘प्रगतिशील साहित्य की धारा’ के भी बहुसंख्य साहित्यकार-विद्वानों में मातृभाषा तो कोई मुद्दा ही नहीं है। जबकि वे अपने लेखन को ज़मीन से जुड़ा से दिखने के फेर में रचना के पात्रों से मातृभाषा में सभी संवाद-दृश्य प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उसी मातृभाषा से वे कोई लगाव नहीं रखते। उलटे मातृभाषा में लेखन को वे दोयम दर्जे का काम समझते हैं।
मातृभाषाओं के विकास को लेकर तमाम निराशाओं के बीच भी एक उम्मीद की रौशनी है- देशज और आदिवासी भाषाओं का अपने अस्तित्व-अस्मिता और सतत विकास के लिए लागातार डटे रहना। इन्हें हर स्तर पर सहयोग और संबल देना भी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का सन्देश है। लेकिन हिंदी पट्टी वालों के लिए तो सवाल तो बना ही रहेगा कि- “कैसे मिटेंगे हिय के शूल?” – अनिल अंशुमन

