भारत ने अभी-अभी वल्र्ड आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस (ए.आई.) इम्पैक्ट समिट होस्ट किया है और हमारे नेता अपनी आजादी की 100वीं सालगिरह तक ‘विकसित भारत’ या एक डिवैल्प्ड देश बनने की बात कर रहे हैं लेकिन हमारी राष्ट्रीय कहानी देश को उल्टी दिशा में ले जा रही है। ऐसा लगता है कि हम डिवैल्प्ड या डिवैल्पिंग देशों से नहीं, बल्कि रिग्रैसिव और ऑर्थोडॉक्स देशों से मुकाबला कर रहे हैं और हम असल में उनसे आगे निकलने की कोशिश कर रहे हैं। कभी-कभी हमारे नेता ही गलत और प्रतिगामी कदम उठा रहे हैं और कभी-कभी आम लोगों का एक हिस्सा, शायद लीडरशिप के असर में, किसी खास समुदाय या किसी खास इलाके, जैसे नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को बेइज्जत करने में कोई झिझक नहीं दिखाता। मैं पिछले एक हफ्ते में फैली कुछ नकारात्मक बातों के उदाहरण बताना चाहूंगा। इनमें सरकारें, न्यायपालिका, विधायिका के साथ-साथ आम लोग भी शामिल हैं।

एक और वीडियो क्लिप जो साफ तौर पर अरुणाचल प्रदेश के स्टूडैंट्स ने शूट की है, में एक कपल स्टूडैंट्स को ‘पार्लर वर्कर’ कहता हुआ और नॉर्थ ईस्ट के स्टूडैंट्स के लिए दूसरे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करता हुआ दिख रहा है। यह जोड़ा उत्तराखंड के उन आवारा लोगों के उलट ‘पढ़ा-लिखा’ लग रहा था, जिन्होंने त्रिपुरा के एक लड़के को सिर्फ इसलिए मार डाला था क्योंकि वह ‘चीनी दिखता था’। जोड़े ने न सिर्फ उन्हें धमकाया, बल्कि यह दावा करके अपनी ताकत दिखाने की भी कोशिश की कि वे एक राजनीतिक नेता के रिश्तेदार हैं। मैं न्यायपालिका में घुस रही सांप्रदायिकता के एक उदाहरण के साथ बात खत्म करता हूं। मद्रास हाई कोर्ट के जज जी.आर. स्वामीनाथन हाल ही में एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए, जो बेशक उनकी निजी पसंद थी, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रम में जो कहा, वह हैरान करने वाला था- ‘जो लोग आध्यात्मिक गुरुओं में विश्वास नहीं करते, वे बदमाश, मूर्ख और जंगली हैं!’ पदेन जज ने कहा। ऐसे और भी उदाहरण हैं, जहां न्यायिक अधिकारियों ने अपनी निजी पसंद को सार्वजनिक किया है, जिससे उन्हें बचना चाहिए।

बिहार का उदाहरण लेते हैं। इसके उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने ऐलान किया है कि शिक्षण संस्थान, धार्मिक जगहों या भीड़-भाड़ वाली सार्वजनिक जगहों के पास मांस की खुली बिक्री की इजाजत नहीं होगी। वैसे, यह पहली बार नहीं है जब कुछ इलाकों में मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया है। धर्म से जुड़े कुछ शहरों में यह पहले से ही है। मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के पीछे उन्होंने जो वजह बताई है, वह अजीब है। इन गुणी के मुताबिक, ऐसा ‘बच्चों में हिंसक आदतों को रोकने के लिए’ किया जा रहा है! ऐसा कोई अध्ययन या डाटा नहीं है कि जो लोग नॉन-वैजिटेरियन होते हैं, उनमें वैजिटेरियन लोगों के मुकाबले ज्यादा हिंसक आदतें होती हैं। उन्हें नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे (एन.एफ.एच.एस.)-5 के नतीजों पर भी हैरानी हो सकती है। 33,755 महिलाओं और 5,048 पुरुषों का सर्वे करने के बाद (एन.एफ.एच.एस.)-5 के डाटा में कहा गया कि भारत में 71.8 प्रतिशत महिलाओं और 83.2 प्रतिशत पुरुषों ने मांस खाने की बात की पुष्टि की है।

फिर गुजरात सरकार का ही मामला लें। इसने शादी के पंजीकरण के लिए माता-पिता की मंजूरी जरूरी करने का प्रस्ताव दिया है। सरकार ने इस गैर-कानूनी कदम का कारण छिपाने की कोशिश नहीं की। इसमें कहा गया कि ‘लव जिहाद के नाम पर राज्य में एक खेल खेला जा रहा है’ और ‘युवा लड़कियों के लिए एक मजबूत कवच बनाने की जरूरत है’। कुछ महीने पहले उत्तराखंड सरकार ने भी सभी लिव-इन पार्टनर्स के लिए जरूरी पंजीकरण का आदेश जारी किया था, भले ही वे व्यस्क कंसल्टिंग पार्टनर हों। ‘जेहादी’, ‘घुसपैठिया’ या ‘मियां’ के बारे में लगातार कही जाने वाली बातों ने पहले ही लोगों की सोच को काफी नुकसान पहुंचाया है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप में लोगों का एक ग्रुप नारे लगाते हुए और उसी ट्रेन के डिब्बे में सफर कर रहे मुसलमानों के एक ग्रुप को भड़काने की कोशिश करता दिख रहा है। राष्ट्रवादी नारे लगाने में कुछ भी गलत नहीं है लेकिन कोई भी उन लोगों का मकसद समझ सकता है, भले ही छोटे बच्चे हैरान आंखों से देख रहे हों।

वल्र्ड ए.आई. इम्पैक्ट समिट पर वापस आते हैं। यह निश्चित रूप से यूथ कांग्रेस के लिए ‘शर्ट-लैस’ प्रोटैस्ट करने के लिए सही जगह नहीं थी। यह काम देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी के साथ विचारों के दिवालियापन को दिखाता है। साथ ही, सरकार ने यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष समेत युवाओं को ‘देश-विरोधी नारे’ लगाने और आपराधिक षड्यंत्र के लिए गिरफ्तार करके ओवर-रिएक्ट किया है। ऊपर दिए गए मामले भले ही आपस में जुड़े न हों लेकिन ये सब मिलकर सांप्रदायिकता, नफरत और असहनशीलता का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जो ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर तेजी से बढऩे के विचार के लिए सही नहीं है।-विपिन पब्बी

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