सर्वोच्च अदालत ने एक किताब पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ (ब्लैंकेट बैन) का आदेश दिया है, जिसमें ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ का अध्याय संकलित था। किताब 8वीं कक्षा में सामाजिक विज्ञान के तौर पर पढ़ाई जानी थी। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्’ (एनसीईआरटी) ने छापी थी। देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत समेत अन्य न्यायाधीश भी बहुत कुपित हुए और इस अध्याय को शामिल करने को ‘गहरी साजिश’ करार दिया। प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि एनसीईआरटी ने गोली चला दी है और न्यायपालिका लहूलुहान है। यह महज एक गलती नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा गिराने और युवाओं के भीतर जहर भरने की एक ‘सोची-समझी साजिश’ लगती है। संस्था के निदेशक ने गलती मानने के बजाय लिखित में इन विवादित अंशों का बचाव किया है। यह और भी गंभीर है। हम पता लगाएंगे। सिर तो कटेंगे, हम गहरी जांच करेंगे। हम न्यायपालिका सरीखे संवैधानिक संस्थान को इस तरह बदनाम नहीं होने देंगे।

न्यायपालिका पर आज भी करोड़ों लोगों का विश्वास, भरोसा है। उसे टूटने कैसे दिया जा सकता है?’ इसी के साथ न्यायिक पीठ ने किताब के फिजिकल या डिजिटल, हार्ड या सॉफ्ट और वेब पोर्टल आदि सभी प्रारूपों और संस्करणों को जब्त करने का आदेश दिया है। किताब की जो 38 प्रतियां बिक चुकी हैं, उन्हें भी हासिल कर जब्त किया जाए। न्यायिक पीठ ने एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी और केंद्रीय स्कूल शिक्षा सचिव को नोटिस जारी कराए हैं। वे 11 मार्च को अदालत में मौजूद रहेंगे। सर्वोच्च अदालत ने यहां तक कहा है कि क्यों न निदेशक के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाए? अदालत ने जो आदेश दिया है, उसकी अनुपालना रपट दो सप्ताह में जमा करानी होगी। सामाजिक विज्ञान की ऐसी किताब और उसमें न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की खबर सामने आई, तो कैबिनेट की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने भी गुस्सा जताते हुए सवाल किया-यह हम क्या पढ़ा रहे हैं? कौन देख रहा है यह सब? ऐसी सामग्री का अनुमोदन कौन कर रहा है? किसी को तो जवाबदेह ठहराना चाहिए। प्रधानमंत्री की यह सख्त टिप्पणी, हालांकि, सूत्रों के हवाले से सार्वजनिक हुई है। बहरहाल किताब के विवादित अध्याय में लिखा गया है कि सर्वोच्च अदालत में करीब 81,000 मुकदमे लंबित हैं, जबकि देश के उच्च न्यायालयों में यह आंकड़ा करीब 62.40 लाख है। 2017-21 के दौरान भ्रष्टाचार की करीब 1600 शिकायतें दर्ज की गईं। प्रधान न्यायाधीश के दफ्तर को जो शिकायतें मिलीं, वे अलग हैं। 2016-25 के दौरान न्यायाधीशों के खिलाफ 8639 शिकायतें मिलीं, यह कानून मंत्रालय ने संसद में खुलासा किया है। क्या ये शिकायतें ही भ्रष्टाचार की प्रमाण हैं अथवा यह व्यवस्था का गंभीर सवाल है? क्या शिकायतों के आधार पर ही मान लिया जाए कि समूची न्यायपालिका भ्रष्ट है और गरीब, जरूरतमंद आदमी के लिए न्याय मिलना बहुत मुश्किल है? दरअसल आजकल संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ संस्थानगत हमले किए जा रहे हैं और यह एक नया फैशन बन गया है। विवादित किताब के लिए क्या लेखक ही ‘खलनायक’ हैं? ऐसा नहीं है, क्योंकि एनसीईआरटी में कई स्तरों पर पाठ्यक्रम और विषय-वस्तु तय किए जाते हैं। विशेषज्ञ और समितियां होती हैं। तो फिर लेखकों को ही ‘काली सूची’ में डालने का औचित्य समझ के परे है। एनसीईआरटी में पाठ्य पुस्तकों को लेकर विवाद होते रहे हैं। यह सरकार की वैचारिक दखलअंदाजी हो सकती है या कुछ और, लेकिन विवाद सामने आते रहे हैं। मसलन-मुगल इतिहास को 12वीं की किताब से हटाया गया। गांधी की हत्या और आरएसएस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को हटाया गया। किताबों में अब 1984, 1992 और 2002 के दंगों के उल्लेख नहीं हैं। संविधान की प्रस्तावना तक पढऩे को छात्रों को वंचित किया गया। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं।

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