आज के प्रधानमंत्री मोदी और उनके लोगों को इतिहास की समझ बिल्कुल नहीं है। स्वतंत्रता की लड़ाई में या इतिहास बनाने के प्रवाह में ये लोग कभी नहीं थे। इसलिए इतिहास बनाने वाले लोगों के प्रति उनके मन में द्वेष है। यह द्वेष उफनकर आता है और इतिहास के सभी शिल्पों पर वे हथौड़ा चलाते हैं, उसे वे राष्ट्रभक्ति कहते हैं। हम गुलामी की निशानियों को मिटा रहे हैं, ऐसा वे कहते हैं। भारत की गुलामी की शृंखला तोड़ने के लिए कई लोगों ने कारावास भोगा, रक्त बहाया, अनगिनत लोग फांसी पर चढ़े। इस गुलामी विरोध की लड़ाई में मोदी और उनका दल कहीं नहीं था, लेकिन सत्ता में आते ही (२०१४) उन्होंने इतिहास की विरासत, वास्तुशिल्प, उन्हें बनाने वाले कलाकारों को नष्ट कर दिया। इसका ताजा उदाहरण है एडविन लुटियन्स। हम जिसे नई दिल्ली के रूप में जानते हैं, उसमें एक बड़े हिस्से का नाम ‘लुटियन्स दिल्ली’ के रूप में इतिहास में दर्ज है। यह लुटियन्स दिल्ली अधिक सटीक, साफ-सुथरी, हरी-भरी, सुव्यवस्थित और स्वच्छ है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विदेशी राजदूत, केंद्रीय मंत्री, सांसदों के आकर्षक निवासस्थान इस लुटियन्स में आते हैं। राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, प्रधानमंत्री का निवासस्थान और कई सरकारी इमारतें लुटियन्स दिल्ली का हिस्सा हैं। इस नई दिल्ली का निर्माण वास्तु शिल्पकार एडविन लुटियन्स ने किया था। इसलिए इस पूरे परिसर को ‘लुटियन्स दिल्ली’ कहा जाता है। हमारे प्रधानमंत्री मोदी को अचानक से यह समझ आया कि लुटियन्स गुलामी का प्रतीक है। लुटियन्स को समाप्त करना चाहिए। मोदी ने एक फरमान जारी किया, राष्ट्रपति भवन से लुटियन्स की मूर्ति हटाओ और वहां भारत के पहले गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी की मूर्ति लगाओ। प्रधानमंत्री मोदी का यह निर्देश अब अमल में आ रहा है।
मैट रिडले की वेदना
लुटियन्स का पुतला राष्ट्रपति भवन से हटाए जाने पर उनके पोते मैट रिडले (श्aूू Rग््तब्) ने नाराजगी जताई है। यह अत्यंत दु:खद है, ऐसा उनका कहना है। लुटियन्स कोई राजनेता नहीं थे, वे एक कलाकार थे और उन्होंने भारत का पहला नई दिल्ली नामक ‘स्मार्ट शहर’ बसाया, जिसका मजा मोदी खुद अब ले रहे हैं। लुटियन्स ने नई दिल्ली में हजारों बंगले, इमारतें बनार्इं तो फिर ये गुलामी के प्रतीक हैं। ऐसे में राष्ट्रपति भवन से लेकर इन सभी इमारतों पर क्या मोदी सरकार बुलडोजर चलाएगी? मोदी का कारभार तुगलकी है। वे कम पढ़े-लिखे हैं। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन उनकी ‘खिंचाई’ कर रहे थे, तब मोदी हंस रहे थे। क्योंकि बाइडेन क्या कह रहे हैं, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा था। ऐसे व्यक्ति को इतिहास और संस्कृति की समझ भी वैâसे होगी? लुटियन्स ने भव्य साउथ ब्लॉक, नॉर्थ ब्लॉक बनाए। रायसीना हिल्स पर ये संरचनाएं हैं। भारतीय वैभव के ये शिल्प हैं। सभी भारतीय शासकों ने यहां से देश चलाया। दस साल यहां सत्ता भोगने के बाद मोदी ने ‘सेवातीर्थ’ नामक अपना नया कार्यालय बनाया। अब गुलामी की बेड़ियां टूट गई हैं, लेकिन भारत को अमेरिका का गुलाम बनाने वाला ‘व्यापार समझौता’ मोदी ने इसी ‘सेवातीर्थ’ से किया। इसलिए देश, हमारा किसान आज भी गुलाम ही है। लुटियन्स द्वारा बनाई गई भारतीय संसद मोदी को ‘गुलामी’ लगी, लेकिन इसी पार्लियामेंट पर भारतीय क्रांतिकारियों ने तब बम फेंका था। उनमें सेनापति बापट भी थे। इसलिए संसद भवन क्रांति और स्वातंत्र्य संग्राम का प्रतीक था। मोदी द्वारा बनाई गई नई संसद एक बाड़ा है। अंदर उत्साही और प्रेरणादायक जैसा कुछ भी नहीं है। गुजरात के किसी भव्य ‘बैंक्वेट हॉल’ जैसा नई संसद का स्वरूप है। भारतीय लोकतंत्र को शोभा देने वाली यह वास्तु नहीं है, लेकिन मोदी को लगा तो ऐतिहासिक संसद भवन को ताला लगा दिया गया। मोदी जब पहली बार सांसद और भावी प्रधानमंत्री के रूप में दिल्ली आए थे, तब पहले के ही संसद की सीढ़ियों पर माथा टेककर अंदर आए थे। तब उन्हें ‘गुलामी’ की याद नहीं आई थी।
सब कुछ चुनाव के लिए
मोदी ने लुटियन्स की जगह सी. राजगोपालाचारी को क्यों लाया? तमिलनाडु, केरल का विधानसभा चुनाव ही इसका जवाब है। सी. राजगोपालाचारी दक्षिण भारत के तमिलनाडु से थे। ऐसे में तमिलनाडु, केरल के प्रचार में मोदी को सी. राजगोपालाचारी का मुद्दा लेकर वोट मांगना है। मैं खुद दिल्ली में कई वर्षों से हूं। शुरुआत में ११, फिरोजशाह रोड पर मैं रहता था। उसी बंगले में स्वतंत्रता के बाद सी. राजगोपालाचारी का ठिकाना था और यह बंगला लुटियन्स ने बनाया था इसलिए वह दूसरी जगह रहने नहीं गए। इन सभी इमारतों और अचल संपत्ति को हमने ब्रिटिशों से संघर्ष करके हासिल किया। यह भारत की संपत्ति है। इसमें गुलामी वगैरह का विषय कहां आता है? भारत का बड़ा सांस्कृतिक इतिहास है। यहां की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत संपन्न है, लेकिन उसकी पहचान कराना, उसका शोध करना आदि महत्वपूर्ण काम ब्रिटिशों ने किया। हमारे पूर्वजों ने एक से बढ़कर एक वास्तुकला, शिल्पकला के उदाहरण खड़े किए, लेकिन लंबे समय तक अज्ञात रहे। इसमें हड़प्पा-मोहनजोदड़ो, अशोक स्तंभ, अजंता-वेरूल की गुफाएं, खजुराहो का समावेश है। सांस्कृतिक भारत की शोध कर उसकी शास्त्रीय चिकित्सा करने में कई ब्रिटिशों की जिंदगी बीत गई। चार्ल्स विल्किन्स ने भगवद्‌गीता का अनुवाद प्रकाशित किया था। भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि की यह साहित्य संपत्ति ब्रिटिश सत्ता जाने के बाद भी रहेगी, इन शब्दों में लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने इस प्रयास का स्वागत किया था।
वैभव
लुटियन्स ने राजधानी के शहर के रूप में नई दिल्ली बनाते समय कलात्मकता, वास्तुकला और प्रकृति का ध्यान रखा था। हर संरचना में भरपूर रोशनी, खुली हवा और सुरक्षा को प्राथमिकता दी। सफदरजंग रोड, अकबर रोड, अशोका रोड, सुनहरी बाग, रायसीना हिल्स पर बंगले हैं, लेकिन एक रोड के बंगले दूसरी रोड के बंगलों जैसे नहीं हैं। दिल्ली में राजधानी लाने का निर्णय जब ब्रिटिश सरकार ने लिया, तब दिल्ली अपर्याप्त लगने लगी। तब नई दिल्ली बनाने का निर्णय हुआ। इस दिल्ली ने सारा स्वरूप ही बदल दिया। लुटियन्स के कारण दिल्ली की ‘मुगली’ निशानियां मिटाने में मदद मिली। स्वतंत्रता के बाद कई सरकारें आर्इं। प्रधानमंत्री आए और गए, लेकिन लुटियन्स दिल्ली को किसी ने नकारा नहीं। राजधानी के वैभव के रूप में सबने उसका जतन किया। प्रधानमंत्री मोदी ने लुटियन्स का अस्तित्व खत्म करने के लिए २० हजार करोड़ का सेंट्रल व्हिस्टा प्रोजेक्ट लाया। विमल पटेल नामक गुजरात के आर्किटेक्ट को यह काम दिया। उसने लुटियन्स की दिल्ली को खोदकर रख दिया। संगमरमर, मार्बल के भव्य ब्लॉक खड़े किए। इसमें कल्पना और वास्तुशास्त्र बिल्कुल नहीं है। लुटियन्स ने नई दिल्ली बनाते समय उसमें ‘जान’ झोंक दी। पैसा कमाना उनका उद्देश्य बिल्कुल नहीं था। आज की दिल्ली एक दु:स्वप्न है। लुटियन्स एक वास्तुशिल्पकार थे, वे कोई वायसरॉय नहीं थे।
मोदी ने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लुटियन्स का पुतला राष्ट्रपति भवन से हटाया।
विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने मोदी का उल्लेख ‘आधुनिक महम्मद गजनी’ के रूप में किया था। विकास के नाम पर मोदी ने गुजरात में तब सैकड़ों मंदिर तो़ड़ डाले। उसके बाद वाराणसी में भी सैकड़ों पुरातन मंदिरों पर बुलडोजर चलाया।
अब उन्हें नई दिल्ली के वास्तुशिल्पकार एडविन लुटियन्स भी नापसंद हो गए!

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