नैनीताल: उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल इन दिनों रंगों के साथ इतिहास की खुशबू से भी सराबोर है. यहां होली के सुरों में इस बार चम्पावत की झलक साफ दिखाई दे रही है. कुमाऊं की प्रसिद्ध खड़ी होली, जिसकी जड़ें चंद राजवंश से जुड़ी मानी जाती हैं, आज भी लोकपरंपरा को जीवंत बनाए हुए है. नयना देवी मंदिर में चंपावत के होल्यारों के द्वारा खड़ी होली का आयोजन किया गया. इस होली का एक अनोखा और रोचक इतिहास भी है. कुमाऊं में होली 15 वीं शताब्दी में महान चन्द शासकों द्वारा लोकप्रिय बनाई गई, चन्द शासकों की आरंभिक राजधानी चंपावत थी. जहां होली का काफी प्रचार प्रसार किया गया. 16 वी शताब्दी में उन्होंने अपनी राजधानी अल्मोड़ा स्थानांतरित की और सम्पूर्ण कुमाऊं को एकता के सूत्र में बांधकर उन्होंने सांस्कृतिक मान्यताओं को सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रसारित कर दिया.

15वीं शताब्दी में चंद राजाओं के दरबारों और काली कुमाऊं क्षेत्र से शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ पूरे कुमाऊं में फैल गई. करीब 400 साल पुरानी इस सांस्कृतिक विरासत में शास्त्रीय राग-रागिनियों, ढोल की थाप और सामूहिक गायन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. खड़ी होली में पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में गोल घेरा बनाकर गीत गाते हैं और कदमताल के साथ वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं. चम्पावत के अलावा पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों में भी यह परंपरा पूरे उत्साह से निभाई जाती है. नैनीताल में जब चम्पावत की यह ऐतिहासिक होली गूंजती है तो लगता है मानो अतीत और वर्तमान एक साथ रंगों में घुल गए हों. यहां की होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत उदाहरण भी है.

काली कुमाऊं की होली से महका नैनीताल
इस बार नैनीताल की सांस्कृतिक संस्था युगमंच द्वारा आयोजित खड़ी होली को खास बनाने के लिए चंपावत जिले के खेतीखान से डॉक्यूमेंट्री निर्माण समिति को आमंत्रित किया गया है. समिति के महासचिव और होल्यार देवेंद्र ओली ने बताया कि उनकी संस्था पिछले 21 वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों में जाकर खड़ी होली का आयोजन कर रही है. साथ ही वे पिछले 10 वर्षों से नैनीताल स्थित माँ नैना देवी मंदिर में भी नियमित रूप से खड़ी होली का आयोजन करते आ रहे हैं. उन्होंने बताया कि खड़ी होली कुमाऊं की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है, जिसे चंपावत क्षेत्र में ‘काली कुमाऊं’ की खड़ी होली के नाम से भी जाना जाता है.

यहां यह नृत्य और गीत के रूप में प्रस्तुत की जाती है और लगभग 70 से 80 प्रतिशत लोग इसमें सहभागिता करते हुए खड़ी होली गाते हैं. देवेंद्र ओली ने कहा कि कुमाऊं मंडल के चंपावत जनपद, पिथौरागढ़ तथा नेपाल से लगे क्षेत्रों में यह प्रमुख पर्व के रूप में मनाया जाता है. एकादशी के दिन गाई जाने वाली खड़ी होली में भगवान की आराधना की जाती है. इस परंपरा का उद्देश्य मन के विकारों और नकारात्मक विचारों को बाहर निकालकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है, ताकि मन और तन दोनों स्वस्थ रहें तथा सभी को आशीर्वाद प्राप्त हो.

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