चीन ने वैसे तौर पर आधिकारिक तौर पर ईरान के साथ सीधे किसी भी तरह के हथियार सौदे से इनकार किया है, लेकिन ईरान की अमेरिका और इजराइल के साथ जंग के बीच विशेषज्ञ तेहरान की हवाई और मिसाइल रक्षा को मजबूत करने में बीजिंग की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं.

फिलहाल ईरान की सैन्य क्षमता काफी हद तक उसकी अपनी घरेलू तकनीक और रूस जैसे दूसरे साझेदारों पर निर्भर है. वहीं News18 को मिली एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण चीन और ईरान के बीच बड़े खुले हथियार सौदे कम दिखाई देते हैं. हालांकि चीन ने फिर भी ईरान को पिछले दरवाजे से मदद पहुंचाई है. वह बड़े पैमाने पर तैयार हथियारों की सीधी डिलीवरी न करके, बल्कि हथियार को पुर्जे-पुर्जे में पहुंचा रहा और फिर उसकी एसेंबली में तकनीकी मदद दे रहा है.

चीन ने भेजी सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल

चीन की तरफ से ईरान को दिए हथियारों में सबसे ज्यादा चर्चा CM-302 सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल की है, जो चीन की YJ-12 मिसाइल का एक्सपोर्ट वर्जन मानी जाती है. यह मिसाइल मुख्य रूप से बड़े नौसैनिक जहाजों जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर, डेस्ट्रॉयर और युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए बनाई गई है. 2025 में 12 दिन के युद्ध के बाद इस पर बातचीत हुई और फरवरी 2026 तक इसे लगभग अंतिम चरण में बताया गया. इसकी मारक क्षमता करीब 290 से 460 किलोमीटर तक है और इसमें 500 किलो का वारहेड लगाया जा सकता है. यह समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ती है, जिससे इसे पकड़ना मुश्किल होता है. अगर यह सिस्टम ईरान को मिलता है, तो फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना के लिए खतरा बढ़ सकता है. हालांकि चीन ने इस सौदे को अंतिम रूप दिए जाने से इनकार किया है.

चीनी S-400 भी ईरान को थमाया

इसके अलावा HQ-9B लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल डिफेंस सिस्टम (SAM) की भी चर्चा है. यह सिस्टम रणनीतिक वायु और मिसाइल रक्षा के लिए बनाया गया है, ताकि परमाणु ठिकानों, बड़े शहरों और सैन्य अड्डों को हवाई हमलों से बचाया जा सके. रिपोर्टों के अनुसार 2025 की गर्मियों से इसकी सप्लाई और तैनाती शुरू हुई. इसकी मारक दूरी लगभग 200 से 260 किलोमीटर तक बताई जाती है.

इसे चीन का उन्नत सिस्टम माना जाता है, जो रूस के S-300 या S-400 के बराबर समझा जाता है. 2025 के हमलों के बाद कमजोर हुई ईरान की वायु रक्षा को मजबूत करने में इसे अहम माना गया. हालांकि 2026 में अमेरिका और इज़राइल की कार्रवाइयों ने दिखाया कि उन्नत हमलों के सामने इसकी क्षमता को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं.

F-35 और B-2 को पकड़ लेगा यह रडार

तीसरा महत्वपूर्ण सिस्टम YLC-8B UHF लंबी दूरी का सर्विलांस रडार है. यह 3D रडार है, जो स्टेल्थ यानी रडार से बचकर उड़ने वाले विमानों जैसे F-35 और B-2 को भी दूर से पकड़ने में सक्षम बताया जाता है. इसकी सप्लाई 2025 में शुरू हुई और कई यूनिट्स ईरान के रक्षा नेटवर्क में जोड़ी गईं. UHF बैंड में काम करने के कारण यह कम दिखाई देने वाले विमानों और बैलिस्टिक मिसाइलों का जल्दी पता लगा सकता है. यह ईरान की वायु रक्षा की अलग-अलग परतों को मजबूत करने में मदद करता है और समय रहते चेतावनी देने का काम करता है.

रिपोर्ट में मिसाइल ईंधन से जुड़े रसायनों और पुर्जों का भी जिक्र है, जैसे सोडियम परक्लोरेट और अमोनियम परक्लोरेट. सोडियम परक्लोरेट को अमोनियम परक्लोरेट में बदला जाता है, जो ठोस ईंधन वाली मिसाइलों में करीब 70 प्रतिशत तक इस्तेमाल होता है. फरवरी 2025 में लगभग 1,000 टन सोडियम परक्लोरेट के ट्रांसफर की बात कही गई है. यह मात्रा 200 से 300 मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें बनाने के लिए काफी मानी जाती है, जैसे हाज कासिम और खैबर शेकन. इन मिसाइलों का इस्तेमाल सटीक हमलों, एक साथ कई हमले करने या सहयोगी समूहों को समर्थन देने के लिए किया जा सकता है. 12 दिन के युद्ध के बाद ईरान के घटे मिसाइल भंडार को दोबारा भरने में इन सामग्रियों की भूमिका अहम मानी जा रही है.

ड्रोन से लेकर MANPADS तक चर्चा

इसके अलावा लुटेरिंग म्यूनिशन यानी आत्मघाती ड्रोन की भी बात सामने आई है. ये ऐसे ड्रोन होते हैं जो टार्गेट एरिया के ऊपर कुछ समय तक मंडराते हैं, फिर निशाना तय करके खुद टकराकर हमला करते हैं. इनका इस्तेमाल कम लागत में सटीक हमले करने के लिए किया जाता है. यह ईरान के पहले से मौजूद शहीद-136 जैसे ड्रोन से मिलते-जुलते हो सकते हैं, हालांकि कुछ रिपोर्ट इन्हें चीनी वेरिएंट बताती हैं. 2025–2026 के दौरान ऐसे ड्रोन की आपूर्ति की खबरें हैं, ताकि युद्ध के बाद ईरान अपने भंडार को फिर से भर सके.

इन सबके अलावा MANPADS (कंधे पर रखकर दागी जाने वाली वायु रक्षा मिसाइल), एंटी-बैलिस्टिक सिस्टम और यहां तक कि एंटी-सैटेलाइट तकनीक पर भी चर्चा की खबरें हैं. कुछ रिपोर्ट यह भी कहती हैं कि चीन खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) से जुड़ी तकनीकी सहायता दे सकता है, हालांकि इन दावों की पुष्टि हार्डवेयर सिस्टम जैसे रडार और मिसाइलों की तुलना में कम स्पष्ट है.

कुल मिलाकर, चीन भले ही खुले तौर पर बड़े हथियार सौदों से इनकार कर रहा हो, लेकिन रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि तकनीकी सहयोग, कल-पुर्जों की सप्लाई और बातचीत के जरिए ईरान अपनी वायु और मिसाइल रक्षा क्षमता को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.

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