ईरान व इस्राइल-अमेरिका के बीच युद्ध से भारत के सामने निर्यात घटने और व्यापार घाटा बढ़ने की चुनौती खड़ी हो गई है। ऐसे में सरकार द्वारा निर्यातकों को विशेष सहयोग व प्रोत्साहन जरूरी है। वहीं व्यापार समझौतों के क्रियान्वयन की गति बढ़ानी होगी।
ईरान और इस्राइल-अमेरिका के बीच युद्ध से निर्मित हालात से भारतीय निर्यात पर पड़ने वाले प्रभाव पर संबंधित मंत्रालयों, निर्यातक संगठनों और शिपिंग कंपनियों द्वारा जारी विचार मंथन में दो अहम बातें सामने आ रही हैं। एक, इस युद्ध से भारत के सामने निर्यात घटने और व्यापार घाटा बढ़ने की नई चुनौती खड़ी हो गई है। दो, युद्ध के दौर में सरकार द्वारा निर्यातकों को हरसंभव सहयोग- प्रोत्साहन, व्यापार समझौतों के क्रियान्वयन और सुधारों की डगर पर आगे बढ़ना होगा।
उल्लेखनीय है कि भारत के लिए अमेरिका, इस्राइल और ईरान तीनों ही निर्यात के अहम बाजार हैं, ऐसे में न केवल इन तीनों देशों में, बल्कि युद्ध प्रभावित पश्चिम एशियाई और यूरोपीय देशों में भी भारत से होने वाले निर्यात प्रभावित होंगे। विभिन्न देशों में भारत से निर्यात होने वाले खाद्य उत्पाद, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, बासमती चावल, चाय, मशीनरी, फार्मास्युटिकल्स, रत्न-आभूषण, प्लास्टिक और रबर जैसे क्षेत्रों में निर्यात प्रभावित हो सकते हैं।
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युद्ध के बीच ईरान द्वारा दुनिया के सबसे अहम तेलमार्ग होर्मुज स्ट्रेट बंद किए जाने से विभिन्न देशों के बाजारों में माल ढुलाई और बीमा प्रीमियम की लागत बढ़ने से भी भारतीय निर्यात प्रभावित हो सकते हैं। इतना ही नहीं, युद्ध के कारण सोने-चांदी की कीमतों में भारी उछाल से इनके आयात के बढ़े हुए मूल्य के कारण भारत का व्यापार घाटा और बढ़ता नजर अा सकता है। ऐसे में अब युद्ध के कारण निर्यात घटने और व्यापार घाटा बढ़ने की नई चुनौती के मद्देनजर भारत द्वारा निर्यात बढ़ाने व व्यापार घाटा नियंत्रित रखने को रणनीतिक कदमों के साथ आगे बढ़ना जरूरी है।
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इसके मद्देनजर चार महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना होगा। पहला, भारत द्वारा विभिन्न देशों के साथ किए गए द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के तहत तेजी से कारोबार और निर्यात बढ़ाने के लिए रणनीतिक कदम आगे बढ़ाना। दूसरा, व्यापार समझौतों का पूरा लाभ उठाने के लिए देश में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और नए सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना। तीसरा, निर्यात के नए बाजारों में प्रवेश करना। चौथा, आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए हाल में पेश केंद्रीय बजट के तहत घोषित निर्यात प्रोत्साहनों के क्रियान्वयन पर नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत से ही ध्यान दिया जाना।
गौरतलब है कि भारत द्वारा कई देशों के साथ जो एफटीए किए गए हैं, उन्हें शीघ्रता से क्रियान्वयन की डगर पर आगे बढ़ाना होगा। इनमें 27 जनवरी को भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) के शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित एफटीए सबसे महत्वपूर्ण है। यह एफटीए दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल का शानदार उदाहरण है और भारत के लिए अत्यधिक लाभप्रद है। इस समझौते को सभी व्यापार समझौतों की जननी यानी मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स कहते हुए रेखांकित किया गया है कि दुनिया के वर्तमान ‘ग्रोथ सेंटर’ और इस सदी के आर्थिक पाॅवर हाउस भारत के साथ यह एफटीए यूरोप को दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते आर्थिक क्षेत्रों में पहली बढ़त दिलाएगा।
पिछले वर्ष 2025 में भारत द्वारा ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ किए गए एफटीए का वर्ष 2026 में कार्यान्वयन अहम होगा। इन सबके साथ-साथ मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों आइसलैंड, स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टीन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के साथ कार्यान्वित हो रहे एफटीए के और अधिक लाभ मिलते हुए दिखाई देंगे। साथ ही इस वर्ष पेरू, चिली, आसियान, मैक्सिको, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इस्राइल, भारत गल्फ कंट्रीज काउंसिल सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ भी नए एफटीए को आकार देने की पहल की जानी होगी।
ईरान और इस्राइल-अमेरिका युद्ध के बीच भारत से निर्यात बढ़ाना कोई सरल काम नहीं। ऐसे में भारत द्वारा निर्यात बढ़ाने के लिए चिन्हित किए गए करीब 200 देशों में निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। एक फरवरी को वित्तमंत्री द्वारा पेश केंद्रीय बजट 2026-27 में विनिर्माण, वस्त्र, चमड़ा और समुद्री भोजन जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए निर्यात बढ़ाने के लिए जो कई रणनीतिक उपाय किए गए हैं, उन पर नए वित्तीय वर्ष में शुरुआत से ध्यान देना होगा।
नि:संदेह, इस समय वैश्विक व्यापार और वैश्विक निर्यात में कमी की चुनौतियां सामने खड़ी है, तब भारत से निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर निर्यातकों की दिक्कतों को कम करना होगा। ये दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं वरन एंटी-डंपिंग शुल्क से भी संबंधित हैं। घरेलू कच्चे माल की ऊंची लागत और ईंधन की उच्च कीमतों के कारण भी भारत द्वारा निर्यात किए जाने वाले उत्पाद वैश्विक स्तर से करीब 15-20 फीसदी की अधिक लागत पर दिखाई देते हैं। निर्यात बढ़ाने के लिए राज्यों में मान्यताप्राप्त आधुनिक प्रयोगशालाएं भी जरूरी हैं।
घरेलू ढांचागत सुधारों के प्रति भी नए सिरे से प्रतिबद्धता आवश्यक होगी। इस हेतु देश में नियमों और नियामक संस्थाओं के कामकाज में मूलभूत बदलाव की जरूरत है। कर सुधारों को और गहराई देने के साथ जीएसटी प्रणाली को प्रभावी बनाया जाये। सिस्टमैटिक्स ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत द्वारा व्यापार समझौतों का अधिकतम लाभ लेने के लिए घरेलू कंपनियों को गुणवता, तकनीक और कुशल कर्मियों के साथ आगे बढ़ना होगा। हमें घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक ताकत बढ़ाने, एफटीए के लिए जागरूकता में इजाफे, गैर-टैरिफ बाधाएं दूर करने, सेवा क्षेत्र का लाभ उठाने, निर्यात में विविधता, कृषि और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा करने के साथ-साथ, पर्यावरण और श्रम मानकों के परिपालन पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

