सितंबर 2024 में खामेनेई ने एक और पोस्ट में भारत का उल्लेख किया, जिसे विदेश मंत्रालय ने भ्रामक बताया। हर बार भारतीय पक्ष ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। भारत का तटस्थ रुख उसे एक मध्य मार्ग पर रखता है- अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए किसी भी गुट को नाराज करने से बचता है। अमरीका-ईरान युद्ध के आगे बढऩे के साथ भारत का रुख भी बदलता रहेगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि स्थिति किस तरह से सामने आती है, चाहे इससे व्यापक युद्ध छिड़े, राजनयिक वार्ता हो या ईरान में सत्ता परिवर्तन हो…

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी ने कई तरह के राजनीतिक और कूटनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। अमरीका द्वारा ईरान पर हमला करने के बाद भारत में ईरान के दूतावास ने दुनिया भर की सरकारों से आग्रह किया था कि वे अमेरिका-इजराइल द्वारा तेहरान पर किए गए हमले और उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को मार दिए जाने की कड़ी निंदा करें। ईरानी दूतावास ने कहा था कि भारत स्थित इस्लामिक गणराज्य, ईरान का दूतावास दुनिया भर की आजाद और स्वतंत्रता की पक्षधर सरकारों से इस जघन्य अपराध की कड़ी निंदा करने तथा अराजकता एवं आक्रामकता के सामने खामोश नहीं रहने का आह्वान करता है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की तरफ से निंदा का कोई बयान नहीं आया। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की निंदा करने के बजाय कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता में कहा था कि ऐसे विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति से ही संभव है। उन्होंने दोहराया कि भारत की नीति हमेशा शांतिपूर्ण समाधान की रही है। सरकार का कहना है कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में बातचीत का रास्ता अपनाना जरूरी है। मोदी की तरफ से अपेक्षित बयान नहीं आने पर विपक्षी दल भडक़

कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की लक्षित हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी को लेकर कहा कि उनका यह रुख भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है। आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने याद दिलाया कि कैसे पीएम मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत के बाद एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया था, जो मई 2024 में अजरबैजान में एक हेलीकॉप्टर क्रैश में सात लोगों के साथ मारे गए थे। संजय सिंह ने कहा मोदी जी, आज क्या हुआ? आपने ईरान के प्रेसिडेंट की मौत पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया था। आप ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर एक भी शोक ट्वीट करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, क्योंकि इसके लिए अमेरिका जिम्मेदार है। भारत का किसी एक देश के लिए यह दृष्टिकोण कोई अपवाद नहीं है, बल्कि भारत की पारंपरिक विदेश नीति के सिद्धांतों के अनुरूप है- जटिल संघर्षों में प्रत्यक्ष गठबंधन से बचना और स्थिरता को प्राथमिकता देना है। भारत की प्रतिक्रिया कई वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रिया के समान है, जिनमें से कई ने संवेदना व्यक्त करने या सीधे तौर पर निंदा करने से परहेज किया है। इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के 57 सदस्यों में से बहुत कम देशों ने शोक व्यक्त किया। रूस, चीन, उत्तर कोरिया, इराक, तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया जैसे कुछ देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसे निंदनीय बताया, जबकि चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने घटना को स्वीकार्य नहीं कहा। इराक में तीन दिन का शोक घोषित किया गया। हालांकि अधिकांश मुस्लिम बहुल देशों ने औपचारिक रूप से संवेदना व्यक्त नहीं की। भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर संयम और संवाद की अपील की। साथ ही ईरान द्वारा संयुक्त अरब अमीरात के सहयोगियों पर किए गए हमलों की आलोचना भी की गई। सरकार का कहना है कि भारत का रुख राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखकर तय किया गया है।

गौरतलब है कि खाड़ी देशों से भारत के द्विपक्षीय संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। विपक्ष द्वारा इस मुद्दे को लेकर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन सरकार ने इसे साम्प्रदायिक रूप देने की बात से दूरी बनाए रखी है। ऐसा नहीं है कि भारत ने किसी देश के मामले में ऐसा स्टैंड पहली बार लिया हो, यह रुख पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर देखा गया है, जहां भारत ने सीधे बयान देने के बजाय संतुलित कूटनीतिक भाषा का उपयोग किया है। भारत की अमरीका-ईरान युद्ध पर सतर्क भाषा रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे पूर्व के संकटों से बिल्कुल अलग है, जिनमें भारत ने प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच संबंधों को संतुलित करने का प्रयास किया था। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी की फोन कॉल पर यूएई के बयान में कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इसमें संकेत दिया गया था कि प्रधानमंत्री मोदी यूएई द्वारा जवाबी कार्रवाई में उठाए जाने वाले किसी भी कदम का समर्थन करते हैं। बयान में कहा गया था कि भारतीय प्रधानमंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अपनी संप्रभुता की रक्षा, अपनी सुरक्षा की सुरक्षा और अपने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए जा रहे सभी उपायों में भारत की एकजुटता व्यक्त की। नेतन्याहू से बातचीत में प्रधानमंत्री मोदी ने घटनाक्रम पर भारत की चिंताओं को व्यक्त किया और शीघ्र युद्धविराम का आह्वान किया। गौरतलब है कि मोदी के नेतृत्व में भारत-इजराइल संबंधों को काफी मजबूती मिली है और तेल अवीव नई दिल्ली के शीर्ष रक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारों में शुमार है। इजराइल को निर्यात होने वाले हथियारों में भारत की हिस्सेदारी 38 फीसदी से अधिक है। हाल के वर्षों में संबंधों में तनाव के बावजूद, ईरान चाबहार बंदरगाह जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं और मध्य एशिया तक क्षेत्रीय पहुंच के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर, भारत ने इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने संबंधों को काफी मजबूत किया है। ये दोनों ही वर्तमान संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

ईरान से व्यापारिक रिश्ते होने के बावजूद कई मौकों पर ईरान ने भारत के खिलाफ प्रतिक्रियाएं दी थी। इस दृष्टि से ईरान भारत का विश्वसनीय सांझेदार कभी नहीं रहा। जबकि अमरीका और इजरायल ने भारत के संवेदनीशल मुद्दों पर कभी ऐसा नहीं किया। इसके विपरीत इजरायल ने हमेशा भारत के रुख का ही समर्थन किया है। साल 2017 से 2024 के बीच अयातुल्ला खामेनेई ने चार बार भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की थी। 2017 में उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर बयान दिया था। 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद उन्होंने नीति पर सवाल उठाया। 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की जिसे भारत ने आपत्तिजनक बताया। ईरान की संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम पर भी आलोचना की थी। सितंबर 2024 में खामेनेई ने एक और पोस्ट में भारत का उल्लेख किया, जिसे विदेश मंत्रालय ने भ्रामक बताया। हर बार भारतीय पक्ष ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। भारत का तटस्थ रुख उसे एक मध्य मार्ग पर रखता है- अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए किसी भी गुट को नाराज करने से बचता है। अमरीका-ईरान युद्ध के आगे बढऩे के साथ भारत का रुख भी बदलता रहेगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि स्थिति किस तरह से सामने आती है, चाहे इससे व्यापक युद्ध छिड़े, राजनयिक वार्ता हो या ईरान में सत्ता परिवर्तन हो।

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