पहली नजर में बात चाय के प्याले में तूफान जैसी थी। लेकिन जरा गहराई से देखें तो एन.सी.ई.आर.टी. की किताब में  न्यायपालिका के भ्रष्टाचार के जिक्र पर उठा बवाल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक गहरी चुनौती की ओर इशारा करता है। सवाल यह नहीं है कि न्यायपालिका को बदनाम करने की साजिश किसने और क्यों की, असली सवाल यह है कि इस साजिश को ढूंढने और इसे रोकने की आड़ में क्या खेल हो गया। एक तीर से कितने निशाने सध गए। किस्सा मामूली सा था। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड सी.बी.एस.ई. स्कूलों के लिए पाठ्य पुस्तक लिखने वाली संस्था एन.सी.ई.आर.टी. की 8वीं कक्षा की समाज विज्ञान की पाठ्य पुस्तक के दूसरे हिस्से में देश की राजनीतिक प्रणाली का परिचय देते हुए एक अध्याय न्यायपालिका पर है, जिसमें एक छोटा सा सैक्शन न्यायपालिका से जुड़ी समस्याओं पर है और एक पन्ना ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ उपशीर्षक से है। सारा बवाल इसी एक पन्ने पर है।

मजे की बात यह है कि इस हिस्से में ऐसा कुछ भी नहीं है जो विवादास्पद हो। मैं न इस किताब से जुड़ा हूं, न ही एन.सी.ई.आर.टी. की इन नई किताबों का मुरीद हूं लेकिन कम से कम इस हिस्से में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है-पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट बताने या फिर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के सनसनीखेज किस्से सुनाने जैसी कोई भी बात इस पुस्तक में नहीं है। बड़े ही सरकारी अंदाज में पुस्तक यह कहती है कि सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की तरह न्यायपालिका की भी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। फिर बस इतना कहती है कि ‘लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करते हैं। इसके कारण गरीब और वंचित लोगों के लिए न्याय हासिल करना और भी कठिन हो जाता है। न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रिया और कमजोर आधारभूत ढांचे के चलते न्यायिक प्रणाली को मामलों के भारी संख्या में लंबित मामलों के बोझ का भी सामना करना पड़ता है।’ 

इसके बाद यह बताया गया है कि न्यायपालिका ने इन चुनौतियों का सामना करने के लिए क्या कुछ किया है-सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई आचार संहिता, आंतरिक जांच व्यवस्था का जिक्र है। कुल मिलाकर एक साधारण सी किताब का नामुराद औपचारिक सा हिस्सा है जो पढऩे के बाद आपको याद भी नहीं रहेगा। बहस इस पर हो सकती है कि 8वीं कक्षा के लिए इस तरह की औपचारिक सूचनाओं का क्या महत्व है। यह पूछा जा सकता है कि क्या इस किताब में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के भ्रष्टाचार का जिक्र भी किया गया है या नहीं। लेकिन न्यायपालिका की अवमानना जैसी कोई बात यहां थी ही नहीं। अब देखिए कि इस हिस्से पर क्या बवाल कटा। इस हिस्से को एक अंग्रेजी अखबार ने पहले पन्ने पर छाप दिया। पढ़कर ऐसा लगता था मानो पाठ्य पुस्तक में कुछ बड़ा क्रांतिकारी प्रयोग हो गया हो। बस फिर क्या था, तुरत-फुरत सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया। उसी सुप्रीम कोर्ट ने, जो हर रोज अखबारों में छपने वाले नफरती बयानों या पाठ्य पुस्तकों के जरिए फैलाए जा रहे झूठ और घृणा के मामलों का स्वत: संज्ञान कभी नहीं लेता। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने इस सच्चाई को सामने लाने के लिए मीडिया का धन्यवाद किया। एन.सी.ई.आर.टी. को कड़ी फटकार लगाते हुए माननीय न्यायाधीश ने इसके पीछे गहरी साजिश का अंदेशा बताया। यही नहीं, कोर्ट की अवमानना के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने की चेतावनी देते हुए एन.सी.ई.आर.टी. को नोटिस दे दिया। 

कोर्ट की इस फुर्ती को देखकर न जाने कितने लोगों ने सोचा होगा-काश कोर्ट अपने अलावा दूसरों के मामले में भी इतनी ही कड़ाई और फुर्ती दिखाता। सुप्रीम कोर्ट के कितने ही आदेश फाइलों में पड़े धूल खा रहे हैं। न्यायपालिका के कितने ही आदेशों की हर रोज धज्जियां उड़ती हैं-मसलन बुलडोजर राज को रोकना या मैला उठाने की प्रथा को बंद करने के आदेश। काश सुप्रीम कोर्ट अवमानना के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग इन मामलों में भी करता। अगर आप एक दिन किसी कचहरी में जाकर वहां व्याप्त भ्रष्टाचार की चर्चा सुन लें तो आप इस किताब तो भूल जाएंगे। कौन याद दिलाता कि कुछ ही महीने पहले पूरे देश ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज साहब के कारनामे की खबरें पढ़ी हैं? कि पिछले 10 साल में उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की 8,630 शिकायतें दर्ज हुई हैं? कौन पूछता कि इनमें से कितने मामलों की जांच हुई है? कि कितने न्यायाधीशों ने अपनी ही बनाई आचार संहिता का पालन किया है? एन.सी.ई.आर.टी. ने एकदम हथियार डाल दिए। अपनी ही किताब के हक में एक भी तर्क दिए बिना माफी मांग ली। सरकार ने हाथ खड़े कर दिए, शिक्षा मंत्रालय ने भी हाथ झाड़ लिए। किताब को रद्द ही नहीं किया गया, बल्कि इसकी प्रतियां वापस मंगा ली गईं। मानो दिन रात झूठी खबरों, नफरती भाषणों और पर्चों तथा भड़काऊ फिल्मों से भरे इस देश में 8वीं की यह किताब सबसे खतरनाक साहित्य था।

माननीय न्यायाधीशों की नीयत जो भी रही हो लेकिन इस आदेश का एक ही अर्थ निकाला जाएगा-कोई भी न्यायपालिका पर उंगली उठाने की जुर्रत न करे। इससे यह संदेह पैदा होता है कि इतिहास के जिस दौर में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गहरे सवाल उठ रहे हैं, वहां अपने गिरेबान में झांकने की बजाय न्यायपालिका आलोचना का मुंह बंद कर रही है। जाहिर है इससे सरकार को भी कोई ऐतराज नहीं होगा। जब तक न्यायपालिका सरकार को अपने विरोधियों का मुंह बंद करने से न रोके। सरकार की आलोचना बंद करने पर न्यायपालिका चुप रहे और न्यायपालिका की आलोचना बंद करने पर सरकार चुप रहे-ऐसी कोई भी जुगलबंदी का संदेश लोकतंत्र के लिए घातक होगा। सवाल 8वीं कक्षा की किताब का नहीं है। सवाल उस किताब का है जिसे हम संविधान कहते हैं।-योगेन्द्र यादव

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