ईरान युद्ध का असर हमारी रसोई और चूल्हे तक आ जाएगा, यह आकलन करने में केंद्रीय कैबिनेट ने 11 दिन खपा दिए। अंतत: कैबिनेट की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी को ऐसे निर्देश देने पड़े कि सभी मंत्रालय आपस में मिल कर काम करें। संभावित चुनौतियों के लिए तैयार रहें। देशवासियों पर युद्ध का असर कम पडऩा चाहिए। प्रधानमंत्री ने ‘चुनौती’ की बात स्वीकार की है और ‘चाहिए’ शब्द का इस्तेमाल कर उपदेश दिया है। यह क्यों नहीं हो सकता कि खुद प्रधानमंत्री मंत्रियों के स्तर पर समन्वय करें। चूंकि वह देश के सर्वोच्च, संवैधानिक कार्यकारी प्रमुख हैं, लिहाजा उन्हें देश को संबोधित कर हकीकत बयां करनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने नोटबंदी, कोरोना वैश्विक महामारी, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कई बार राष्ट्र को संबोधित किया है। देशवासियों ने उन्हें भरपूर समर्थन और सहयोग भी दिया है। बहरहाल भारत में करीब 19.5 करोड़ घन मीटर गैस की खपत औसतन हर रोज होती है, जबकि गैस का घरेलू उत्पादन करीब 10 करोड़ घन मीटर ही है, जाहिर है कि भारत को गैस आयात करनी पड़ती है। इसमें रसोई गैस एलपीजी के अलावा, एलएनजी, पीएनजी, सीएनजी भी हमारी जिंदगी की सक्रियता के लिए बेहद अनिवार्य हैं। उनके बिना जिंदगी, समाज और कारोबार का चक्का ही जाम हो जाएगा। पीएनजी पाइपलाइन के जरिए हमारे घरों तक जाती है और 1.62 करोड़ इसके कनेक्शन हैं। एलपीजी के 33 करोड़ से अधिक उपभोक्ता हैं। सीएनजी वाहनों में इस्तेमाल की जाती है। एलएनजी खाद के प्लांट से लेकर औद्योगिक उत्पादन, विनिर्माण की इकाइयों के लिए ‘संजीवनी’ है। प्रधानमंत्री मोदी देश को संबोधित कर खुलासा कर सकते हैं कि भारत ने अमरीका के साथ 22 लाख टन गैस का सौदा किस आधार पर किया है? इसके अलावा, ऑस्टे्रलिया, कनाडा, नॉर्वे, पश्चिम अफ्रीका, नाइजीरिया, अंगोला और अल्जीरिया सरीखे देशों से पर्याप्त गैस की आपूर्ति का अपडेट क्या है?

ये छोटे, पिद्दी से देश भारत जैसे विराट, विशाल देश को गैस सप्लाई कर रहे हैं, लेकिन खुद 78 साल का भारत अपने लिए गैस का पर्याप्त उत्पादन करने में सक्षम क्यों नहीं हो सका? यह वाकई यक्ष-प्रश्न है। गैस की जानकारी देश को देने में गोपनीयता क्या है? कूटनीतिक रणनीति क्या है? आपकी तेल-गैस की सप्लाई को कौन ‘तारपीडो’ करेगा? यह तो आम भारतवासी की जिंदगी और चूल्हे से जुड़ा संवेदनशील विषय है। आखिर प्रधानमंत्री आपदा या संकट के दौर में देश की जनता, विपक्ष और मीडिया को खुलासा क्यों नहीं करेंगे? ऊर्जा-संकट से ही हमारी खाद्य-सुरक्षा प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ी है। ठीक है, केंद्र सरकार ने ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955’ की अधिसूचना जारी कर उसे लागू कर दिया है, लेकिन आम आदमी सडक़ पर उतरने को विवश है। गैस सिलेंडर लेकर लोगों ने उसी तरह कतारें लगाना शुरू कर दिया है, जिस तरह कोरोना महामारी के दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर को लेकर हुआ था। वह संकट भी फर्जी था, चिंता और अफवाहें ज्यादा थीं। मौजूदा संकट आम रसोई के मद्देनजर है कि शाम को गैस का चूल्हा जलेगा या नहीं, घर का खाना बनेगा अथवा नहीं। यह संकट उस वर्ग का ज्यादा है, जिसकी जिंदगी धक्के खाने में खप जाती है, जिसके संसाधन बेहद सीमित हैं और जिसने जनादेश देकर नरेंद्र मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाया है। क्या प्रधानमंत्री उन लोगों को भी संबोधित नहीं कर सकते? इस संकट के दरमियान ही अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप का बयान आया है कि युद्ध का काम लगभग पूरा हो चुका है। अर्थात अमरीका युद्ध को समाप्त करने और निकलने का सुरक्षित रास्ता तलाश रहा है, लेकिन इजरायल और ईरान फिलहाल ऐसा नहीं सोच रहे, जाहिर है कि तेल-गैस का संकट बरकरार रहेगा, बल्कि बढ़ भी सकता है। करीब 60 देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ चुकी हैं। बहरहाल रूस हमारे लिए चमकती हुई उम्मीद है। वह गैस का सबसे बड़ा निर्यातक देश है और कच्चे तेल का भी दूसरा सबसे बड़ा देश है। अमरीका ने रूस पर से तेल-गैस संबंधी पाबंदियां हटा ली हैं। रूस ने हमें कच्चा तेल और गैस की आपूर्ति शुरू भी कर दी है। करीब 95 लाख बैरल तेल भारतीय तट पर मौजूद है।

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