एकाध वर्ष में हम दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएंगे, और आजादी के सौ वर्ष पूरे होने के जश्न तक एक पूरे विकसित राष्ट्र के शायद सर्वोपरि हो जाने का गर्व स्वीकार करेंगे। सर्वोपरि का अर्थ जानते हो, दुनिया की नंबर एक शक्ति जो अमरीका और चीन को भी पछाड़ देगी। इसके साक्ष्य के लिए हम कहते हैं, पूरा विश्व बरसों से मंदी-ग्रस्त है, लेकिन हमारी विकास दर की गति आज भी सबसे अधिक है। तनिक थोड़ी-सी पहचान कर लें कि कहां हो रहा है यह विकास? भई विकास तो हो रहा है। पहले कहते थे, भारत की दस प्रतिशत आबादी के पास नब्बे प्रतिशत सम्पदा है, और नब्बे प्रतिशत आबादी के पास दस प्रतिशत! अब विकास यह हुआ कि जिस दस प्रतिशत के पास नब्बे प्रतिशत सम्पदा थी, उनमें से भी एक प्रतिशत के पास इस कुल सम्पदा का आधा भाग आ गया है। एक आर्थिक तरक्की के तो आप पायदान-दर-पायदान चढ़ते चले गए, लेकिन यह तरक्की बहुमंजिली इमारतों के कंगूरों पर टंगी रह गई, और फुटपाथी आदमी अतिक्रमण के आरोप में अपना फुटपाथ भी गंवा बैठा। यह कैसा जन-कल्याण है भाई जो अनुदान अनुग्रह के आधार पर चलता है। देश में दिलासा और सान्त्वना का मतलब है कि सस्ते राशन और मुफ्तखोरी की अवधि और बढ़ा दी जाए। अमीरों की बस्ती में बढ़ती खुशहाली की चमक दमक बढ़ाएं और निर्धन युवा बल के सस्ती रेवडिय़ों के प्रासाद पर और अधिक आधारित होते जाएं। एक देश एक चुनाव के नारों पर मतैक्य नहीं हो सका, और दल बदल से सरकारें गिरा नए चुनावों की घोषणा बार-बार लोकतंत्र की परीक्षा लेती है। हम गर्वित होते हैं कि एक और चुनाव शांति से निबट गया, और आम जनता को वायवीय सपनों की एक और बारात भेंट कर गया।
आजकल सपनों का मिजाज बदल गया है। पहले सपना राष्ट्र के कायाकल्प का देखा जाता था। एक आदर्श समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना का सपना। आज सपना बैंक खातों में बिना काम पन्द्रह लाख आ जाने का है। सपना लाख का देखते हैं, दस हजार खाते में आ गए, तो एक राज्य की सरकार फिर सत्तारूढ़ हो गई। ये सत्तारूढ़ बार-बार चुने जाने का रिकार्ड बना रहे हैं। परिवारवाद के परम आलोचक अपने-अपने नाती-पोतों के लिए अपनी गद्दियां सुरक्षित छोड़ कर जाना चाहते हैं। देश में एक नया सत्य स्थापित हो गया है, जो कथनी है, वह करनी नहीं। और जो करनी है उस पर समाज परिवर्तन के मिथ्या लेबुल लगे हैं। इन लेबुलों का हमने अमृत महोत्सव मना लिया किन्तु देश वहां का वहां ही खड़ा है। पूंजी निर्माण का अर्थ यहां पूंजीवाद का विकास हो गया है। इस विकास की सार्थकता इस बात से सिद्ध हो गई, कि देखो विकास तो हो गया। एशिया में अरबपतियों के बढऩे की संख्या भारत में सबसे अधिक हो गई। निर्धनों की संख्या गिनने की जरूरत ही क्या? उनकी गरीबी तो है ही सात जन्मों के पापों का फल। बस इस जन्म में दैन्यता और झेल लो, अगले जन्म में आत्मविश्वास और अट्टालिकाओं का उपहार मिल जाएगा।
कई बार सवाल किया जाता है कि इस देश में इन गरीबों की बढ़ती भीड़ के संकट का आपने क्या समाधान किया? जवाब मिलता है हमने उन्हें गारंटी दे दी है, कि किसी को भूख से मरने नहीं देंगे। उनके लिए उम्र भर के लिए सस्ती रोटियां बांटने का इंतजाम कर दिया है। हमारा प्रण है कि किसी भूखे, बेकार को हम आत्महत्या नहीं करने देंगे। उन्हें बताते हैं, नौजवानों, किसानों और सपना टूटे लोगों की खुदकुशी की संख्या तो कम नहीं हुई। जवाब मिलता है, उदास रहना, इन लोगों की मूल प्रवृत्ति बन गई है, और काम न करना इनकी पैतृक आदत। लीजिए, लग गया पता। यहां खुदकुशियों का कारण इनकी वंचना या प्रवंचना नहीं, बल्कि मनोरोगों का बढऩा है।-सुरेश सेठ

