न्यूयॉर्क। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 130 से अधिक देशों के साथ बुधवार को उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें खाड़ी देशों और जॉर्डन के खिलाफ ईरान के हालिया ‘भीषण’ हमलों की निंदा की गई है। यह प्रस्ताव ईरान के हमलों की भर्त्सना करता है और शत्रुता को तत्काल समाप्त करने का आह्वान करता है। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन को अवरुद्ध करने, बाधित करने या हस्तक्षेप करने की ईरान की किसी भी कार्रवाई या धमकी की कड़ी निंदा की गई है। इसके साथ ही ईरान द्वारा बाब-अल-मंदेब में समुद्री सुरक्षा को खतरे में डालने वाले किसी भी कदम की भी निंदा की गई है।
सुरक्षा परिषद के 15 में 13 सदस्यों ने बहरीन की ओर से पेश किए गए इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। किसी भी देश ने इसके खिलाफ मतदान नहीं किया, जबकि चीन और रूस ने मतदान में भाग नहीं लिया। इस प्रस्ताव का भारत के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जापान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, ब्रिटेन और अमरीका सहित 130 से अधिक देशों ने सह-प्रायोजन किया।
कुल 135 सह-प्रायोजकों के साथ, प्रस्ताव ने बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन की क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए मजबूत समर्थन दोहराया। इसमें इन देशों के क्षेत्रों के खिलाफ ईरान द्वारा किए गए हमलों की ‘कड़े शब्दों में’ निंदा की गई और कहा गया कि ऐसी कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है और अंतरराष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। प्रस्ताव में ईरान से पड़ोसी देशों के प्रति किसी भी उकसावे या धमकियों को ‘तत्काल और बिना शर्त’ रोकने की मांग की गई है।
अमरीका के प्रतिनिधि ने कहा कि ईरान सभी दिशाओं में हमले करता है। वहीं, डेनमार्क के प्रतिनिधि ने कहा कि इस ‘महत्वपूर्ण क्षण में क्षेत्र की आवाजों को सुनना अनिवार्य है।’ प्रस्ताव में यह भी दोहराया गया कि व्यापारिक और वाणिज्यिक जहाजों को अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार अपने नौवहन अधिकारों और स्वतंत्रता का प्रयोग पूर्ण अधिकार होना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राजदूत माइक वॉल्ट्ज़ ने कहा कि यह प्रस्ताव ईरानी शासन की क्रूरता की स्पष्ट निंदा है। वॉल्ट्ज़ ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम ने राजनयिक बातचीत के हर प्रयास को आज़मा लिया था। उन्होंने कहा, “ट्रंप ने अपनी ‘रेड लाइन’ खींची थी, ईरान ने उसे फिर से पार कर लिया और अब दुनिया इसके परिणाम भुगत रही है।”
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत अमीर सईद इरावानी ने परिषद के इस कदम की आलोचना करते हुए इसे ‘अन्यायपूर्ण और गैरकानूनी’ बताया। उन्होंने सुरक्षा परिषद को याद दिलाया कि 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से अमरीका और इजरायल द्वारा किए जा रहे सैन्य हमलों में महिलाओं और बच्चों सहित 1,348 से अधिक नागरिक मारे गए हैं और 17,000 से अधिक घायल हुए हैं।
इरानी दूत ने कहा कि अमरीका और इजरायल के इन हमलों ने हजारों घरों, स्कूलों और चिकित्सा सुविधाओं को नष्ट कर दिया है, जो स्पष्ट रूप से युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने के दावे पूरी तरह से असत्य हैं। उन्होंने इजरायल पर अमेरिका को क्षेत्रीय संघर्ष में घसीटने का आरोप लगाया।

