देश में हर वर्ष गर्मी के साथ जल संकट की चर्चा तेज हो जाती है, लेकिन इस बार हालात और गंभीर होने की आशंका जताई जा रही है. मौसम विभाग का अनुमान है कि इस वर्ष देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्मी पड़ेगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का स्वभाव तेजी से बदल रहा है. इसका सीधा असर वर्षा के पैटर्न और जल संसाधनों पर पड़ रहा है. ऐसे में पेयजल संकट केवल पर्यावरण या मौसम का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन चुका है.

भारत को प्रकृति ने जल के मामले में कंजूस नहीं बनाया है. औसतन हर वर्ष लगभग 110 सेंटीमीटर वर्षा से देश को करीब 4000 घन किलोमीटर पानी प्राप्त होता है, जो दुनिया के कई देशों की तुलना में कहीं अधिक है. इसके बावजूद विडंबना यह है कि इस जल का मात्र 15 प्रतिशत ही संचित हो पाता है, जबकि शेष 85 प्रतिशत पानी नालों और नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है. स्पष्ट है कि समस्या पानी की कमी से अधिक उसके प्रबंधन की है.

भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किलोमीटर है और लगभग पूरा क्षेत्र किसी न किसी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में आता है. हर वर्ष भारतीय नदियों के माध्यम से करीब 1645 घन किलोमीटर पानी बहता है, जो दुनिया की नदियों के कुल प्रवाह का लगभग 4.4 प्रतिशत है. लेकिन बड़ी चुनौती यह है कि यह जल वर्ष के कुछ महीनों में ही उपलब्ध रहता है. उत्तर भारत में लगभग 80 प्रतिशत और दक्षिण भारत में करीब 90 प्रतिशत नदी जल जून से सितंबर के बीच ही मिलता है. शेष आठ महीनों में जल की उपलब्धता काफी सीमित हो जाती है.

यही कारण है कि देश के 13 राज्यों के 135 जिलों में लगभग दो करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि पर हर दस वर्षों में चार बार गंभीर जल संकट खड़ा हो जाता है. यदि वर्षा औसत से थोड़ी भी कम हो जाए तो स्थिति और विकराल हो जाती है. दरअसल, हमने अपनी पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों को लगभग भुला दिया है. कभी गांव-गांव में तालाब, कुएं, बावडिय़ां और छोटी नदियां वर्ष भर जल का स्रोत हुआ करती थीं. ये जल संरचनाएं वर्षा के पानी को संचित कर पूरे वर्ष जीवन को सहारा देती थीं. आज इनका बड़ा हिस्सा या तो समाप्त हो चुका है या फिर गंदे पानी के निस्तारण का साधन बन गया है.कृषि पद्धति में भी बदलाव ने संकट को बढ़ाया है. कम पानी में उगने वाले मोटे अनाज,ज्वार, बाजरा और कुटकी की खेती लगातार घटती गई है, जबकि अधिक पानी मांगने वाली नकदी फसलों जैसे सोयाबीन और अन्य फसलों का विस्तार हुआ है. इससे खेती की निर्भरता वर्षा पर और बढ़ गई है.

जल संकट के समाधान के लिए सबसे पहले जल संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा. वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाने, पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को सुरक्षित रखने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे. अवैध रेत खनन, नदियों में कचरा और मलबा डालने जैसी गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण जरूरी है.

साथ ही समाज को भी अपनी जल उपयोग की आदतों में बदलाव लाना होगा. कभी जब कुओं से रस्सी डालकर पानी निकाला जाता था, तब लोग उतना ही जल उपयोग करते थे जितनी आवश्यकता होती थी. आज ट्यूबवेल और बोरवेल ने पानी को सहज उपलब्ध तो बना दिया है, लेकिन इसके अंधाधुंध दोहन ने भूजल स्तर को खतरनाक स्थिति में पहुंचा दिया है.

स्पष्ट है कि यदि समय रहते ठोस और सामूहिक प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है. इसलिए सरकार, प्रशासन और समाज,सभी को मिलकर पेयजल संकट से निपटने के लिए युद्ध स्तर पर तैयारियां करनी होंगी. जल संरक्षण ही भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा है.

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