हम स्वर्ण काल में जी रहे हैं। जी हाँ, यह कलयुग का स्वर्ण काल है। यह कलयुग का सतयुग है। हमारे पास इस समय इस युग के, इस स्वर्ण काल के त्रिदेव हैं। हमारे ट्रंप जी हैं, नेतन्याहू हैं और हमारे सरकार जी तो हैं ही। तीनों की जोड़ी ऐसी है कि न भूतो, न भविष्यति। 

तीनों शांति के पुजारी हैं। इनमें से एक, ट्रंप जी तो शांति के इतने बड़े पुजारी हैं कि हम उनका एक नाम शांति ही रख सकते हैं। दूसरा नाम सत्यवादी है। उनके पिछले कार्यकाल में लोग यह ढूंढ़ते ढूंढ़ते थक गए थे कि उन्होंने कितना सच बोला। जब उन्हें कुछ नहीं मिला तो उन्होंने ट्रंप जी के झूठ बोलने की ही गिनती शुरू कर दी। पर हमारे यहाँ यह काम करने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई। हिम्मत दिखाई होती तो इस काम में हमारे सरकार जी ट्रंप जी से बीस ही बैठते।

तो हमारे ट्रंप जी ने। नहीं, नहीं, मैंने गलत नहीं लिखा है। जैसे वे हमारे देश के बारे में निर्णय ले रहे हैं, हमारे और पाकिस्तान के बीच सीज़ फायर करवाई, हम पर टैरिफ थोपा, पहले हमें रूस से तेल लेने से रोका और अब हमें परमिशन दी कि हम रूस से तीस दिन तेल ले सकते हैं, हम उन्हें हमारे ट्रंप जी भी लिख ही सकते हैं। वैसे अमेरिका के तो वे हैं ही। अब हमारे भी बन गए हैं। तो हमारे ट्रंप जी ने, जैसे ही दूसरी बार राष्ट्रपति बने, निश्चय किया कि वे नोबेल शांति पुरस्कार अवश्य पाएंगे। इसके लिए उन्होंने अथक प्रयास भी शुरू कर दिया। अपने दूसरे टर्म के पहले साल से ही ये प्रयास शुरू कर दिये थे और आज तक जारी हैं।

पहले साल में, मतलब 2025 में उन्होंने भारत पाकिस्तान युद्ध रुकवाया। और ऐसे रुकवाया कि जैसे दो बच्चे आपस में झगड़ रहे हों और उनका पापा आ कर लॉलीपॉप का लालच दे कर उनका झगड़ा बंद करवा दे। युद्ध रुकवाने की बात उन्होंने बार बार कही और किसी ने भी, न तो भारत ने और न ही पाकिस्तान ने इस बात का खंडन किया तो इसे सच ही मान सकते हैं। वैसे भी सत्यवादी ट्रंप जी यह बात, यह युद्ध रुकवाने की बात, कम से कम सौ बार तो कह ही चुके हैं। सच तो सच है, इतनी बार कहा जाये तो झूठ भी सच ही बन जाता है। पर नोबेल शांति पुरस्कार दूर ही रहा। 2025 में वह मिला वेनेज़ुएला की मारिया कोरिना मचाडो को।

जो लोग यह मानते हैं कि ट्रंप जी ने वेनेज़ुएला पर आक्रमण तेल के लिए किया, उन्हें कुछ नहीं पता है। ट्रंप जी ने वेनेज़ुएला पर अधिकार न तो तेल के लिए जमाया और न ही वहां की जनता को कोई अधिकार दिलाने के लिए। वेनेज़ुएला पर आक्रमण तो सिर्फ नोबेल शांति पुरस्कार के लिए किया गया था। और ट्रंप जी को शांति तब तक नहीं मिली जब तक मारिया कोरिना मचाडो ने स्वयं अमेरिका जा कर ट्रंप जी को अपना नोबेल शांति पुरस्कार दे नहीं दिया। पर बुरा हो नोबेल पुरस्कार समिति का। उसने कह दिया, इस तरह से कोई अपना पुरस्कार किसी दूसरे को नहीं दे सकता है। इस तरह, नोबेल पुरस्कार ट्रंप को दे कर भी मारिया कोरिना मचाडो के पास ही रहा। ट्रंप जी को नहीं मिला। ट्रंप जी इस पुरस्कार से वंचित ही रहे।

तो ट्रंप जी की नोबेल शांति पुरस्कार की खोज अभी 2026 में भी जारी है। पर अब ऐसा युद्ध कहीं भी नहीं चल रहा है जिसे ट्रंप जी रुकवा पाते। रूस युक्रेन में युद्ध चल रहा है पर पुतिन ट्रंप की बात सुन ही नहीं रहे हैं। उनका नाम न तो एप्सटीन फाइल्स में है और न ही उन पर टैरिफ की धमकी चल रही है कि वे ट्रंप की हाँ में हाँ मिलाएं।

उधर इजराइल फिलिस्तीन युद्ध में ट्रंप जी खुद नहीं चाहते हैं कि इजराइल उनकी बात माने और शांति स्थापित हो। इजराइल फिलिस्तीन युद्ध तो अमरीकी हथियारों की टेस्टिंग साइट बना हुआ है। तो भला कौन चाहेगा कि उसके हथियारों की टेस्टिंग साइट बंद हो जाये।

अब शांति स्थापित करनी है, 2026 का नोबेल चाहिए तो कहीं न कहीं कोई युद्ध तो होना चाहिए। कहीं कोई ऐसा युद्ध जिसमें ट्रंप जी युद्ध विराम करवाएं। युद्ध विराम करावाने के लिए युद्ध अतिआवश्यक है। शांति की स्थापना के लिए अशांति जरूरी है।

तो ट्रंप जी ने सोचा कि ईरान से युद्ध करते हैं। वेनेज़ुएला ने तो युद्ध लड़ा ही नहीं कि वहां शांति स्थापित करते और 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार पर दावा ठोक सकते। युद्ध थोपना ही था तो लगा ईरान ठीक है। इजराइल भी साथ है ही। मदर लैंड विश्वगुरु ने भी इजराइल को फादर लैंड घोषित कर ही दिया है। तो फिर अब लड़ाई छेड़ने में कोई दिक्कत भी नहीं है। हमारे सरकार जी इजराइल को फादर लैंड घोषित कर देश लौटे ही थे कि फादर लैंड ने गॉड फादर के साथ मिल कर युद्ध शुरू कर दिया।

यह युद्ध किसी और मकसद से नहीं छेड़ा गया है। लड़ाई छेड़ने का ट्रंप जी का सिर्फ एक ही मकसद है। और वह मकसद बड़ा ही नेक है, साफ सुथरा है। मकसद युद्ध करना नहीं, युद्ध बंद करवाना है। सीज़ फायर करवाना है। शांति स्थापित करना है। नोबेल पीस प्राइज प्राप्त करना है। तो यह लड़ाई, यह अमेरिका इजराइल-ईरान युद्ध एक नेक मकसद से छेड़ा गया है। वह नेक मकसद है, युद्ध रोक कर शांति स्थापित करना और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अपना दावा मज़बूत करना। 

ऐसे नेक काम के लिए हम सबको ट्रंप जी का साथ देना चाहिए। साथ देना चाहिए कि ट्रंप जी ईरान और अमेरिका इजराइल के बीच का युद्ध जल्द ही रुकवाएं और इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदार बनें। और हाँ, नोबेल पुरस्कार समिति भी ट्रंप जी को 2026 में ही नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान कर देना चाहिए जिससे विश्व में शांति आ सके। ट्रंप जी लड़ाई रुकवाने के लिए इसके बाद कोई और लड़ाई न छेड़ सकें। वैसे नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बाद भी शांति की, नया युद्ध न छेड़े जाने की कोई गारंटी नहीं है।-डॉ. द्रोण कुमार शर्मा

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