इजरायल की ओर से अपने गैस फील्ड साउथ पार्स को निशाना बनाए जाने के जवाब में ईरान ने जिस तरह सऊदी अरब, कतर और कुवैत की रिफाइनरियों पर हमले किए, उसके बाद कच्चे तेल के दाम बढ़ने ही थे। समस्या केवल यह नहीं कि तेल के दाम बढ़ते ही चले जा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि खाड़ी के देशों से उसकी आपूर्ति में भी कठिनाई आ रही है। तेल के साथ गैस की आपूर्ति में भी मुश्किलें पेश आ रही हैं।
साफ है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ा युद्ध ऊर्जा संकट को गंभीर बनाने का काम कर रहा है। ईरान ने अपने यहां के ऊर्जा स्रोतों पर हमले के जवाब में पड़ोसी देशों के ऐसे ही स्रोतों को निशाना बनाने की जो रणनीति अपनाई है, उससे अमेरिका के साथ खाड़ी के देश ही नहीं, पूरी दुनिया परेशान है। यह साफ है कि अमेरिका ने यह सोचा ही नहीं था कि ईरान इस तरह ऊर्जा संकट गहराने की रणनीति अपना सकता है, लेकिन वह इसी रणनीति पर चल रहा है।
पहले उसने खाड़ी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति के समुद्री मार्ग होर्मुज को बाधित किया, फिर उसने इन देशों के ऊर्जा स्रोतों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। ईरान ने खाड़ी देशों के कुछ ऊर्जा स्रोतों को तो इस तरह निशाना बनाया कि उनसे तेल और गैस का उत्पादन ही ठप हो गया है।
चूंकि तेल और गैस के उत्पादन में कमी के साथ उसकी आपूर्ति भी बाधित हो गई है, इसलिए पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट की तपिश झेलनी पड़ रही है। कई देशों को तेल और गैस के दाम बढ़ाने पड़े हैं। कुछ देशों में गैस की किल्लत होने से घरों में खाना बनाने के साथ-साथ छोटे-बड़े उद्योग चलाना भी कठिन हो गया है।
तेल एवं गैस के दाम बढ़ने और उनकी आपूर्ति प्रभावित होने से दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट भी देखी जा रही है। एक तरह से ईरान पर हो रहे अमेरिका एवं इजरायल के हमले और उनके जवाब में ईरान की कार्रवाई वैश्विक हितों पर तगड़ी चोट पहुंचाने का काम कर रही है। वैश्विक हितों के लिए यह जो गंभीर खतरा पैदा हो गया है, उसके लिए सीधे तौर पर अमेरिका जिम्मेदार है।
यदि वह ईरान पर हमला करने के लिए तैयार नहीं होता तो इजरायल शायद ही अपने दम पर ऐसा करने के लिए आगे आता। अब तो ऐसा लगता है कि इन दोनों में रणनीतिक तालमेल का भी अभाव है। इसका संकेत इजरायल की ओर से ईरान के गैस फील्ड को निशाना बनाए जाने पर अमेरिका की असहमति से मिलता है।
इस असहमति मात्र से बात बनने वाली नहीं है, क्योंकि ईरान भी संयम बरतने को तैयार नहीं दिख रहा है। अब जब पश्चिम एशिया का संकट विश्व का संकट बन गया है, तब भारत समेत विश्व के सभी समर्थ देशों को इस युद्ध को बंद कराने के लिए सक्रिय होना चाहिए और इसके लिए अमेरिका पर दबाव बढ़ाना चाहिए।

