प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान युद्ध के दौरान पहली बार अपने 13 वरिष्ठ मंत्रियों के साथ विमर्श किया और हालात की समीक्षा की। सरकार देश भर में पेट्रोल-डीजल, गैस, उर्वरक के साथ-साथ आवश्यक वस्तुओं की निरंतर आपूर्ति और उपलब्धता को लेकर चिंतित है और प्रयास भी कर रही है। यह स्वागतयोग्य आचरण है। प्रधानमंत्री ने मंत्रियों-सचिवों के समूह बनाने का निर्देश दिया है, ताकि हर स्तर पर समन्वय बरकरार रहे और आम आदमी को न्यूनतम परेशानियां झेलनी पड़ें। आयात और निर्यात के वैकल्पिक स्रोत खंगालने पर भी चर्चा हुई, क्योंकि युद्ध के बाद भी खाड़ी देश, भारत के लिए, अनिश्चित और अस्थिर रहेंगे। खतरे भी बने रहेंगे, लिहाजा वैकल्पिक सप्लाई चेन ही अंतिम रास्ता है। अब भारत ने ऑस्टे्रलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, अल्जीरिया, नीदरलैंड, नॉर्वे आदि देशों के विकल्प स्थापित करने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान, इजरायल, मलेशिया, जॉर्डन, ओमान, कतर, कुवैत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों के राष्ट्राध्यक्षों, शासनाध्यक्षों, किंग, अमीर आदि से फोन पर संवाद किए हैं, जाहिर है कि प्रधानमंत्री ने अपनी चिंताएं और सरोकार साझा किए हैं और बार-बार शांति, स्थिरता, कूटनीति की पैरोकारी की है। फ्रांस, जर्मनी, फिनलैंड, स्पेन, स्विट्जरलैंड सरीखे देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार-प्रमुखों ने प्रधानमंत्री मोदी से लगातार आग्रह भी किया है कि युद्धग्रस्त देशों के दरमियान भारत सफल मध्यस्थता कर सकता है, क्योंकि अमरीका, इजरायल, ईरान भारत के मित्र-देश हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और एक सार्थक लोकतंत्र भी है, लिहाजा भारत की भूमिका सर्वस्वीकार्य है। भारत ब्रिक्स देशों का भी अध्यक्ष है, उस नाते उन देशों को युद्धविराम में महती भूमिका निभाने को भी सहमत कर सकता है।

यकीनन प्रधानमंत्री मोदी को इस संदर्भ में प्रयास जरूर करने चाहिए। बहरहाल प्रधानमंत्री और मंत्रियों ने तमाम विकल्पों पर विमर्श किया होगा, लेकिन हमारी जिज्ञासा है, सख्त सवाल नहीं है, कि आज 147 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश, आजादी और संप्रभुता के 78 साल के बाद भी, कच्चे तेल, गैस, उर्वरक के मामले में आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पाया है? पिद्दी से देशों में तेल-गैस के अपरिमित भंडार हैं, क्या भारत में तेल-गैस के मद्देनजर ‘सूखे’ की स्थिति है? पेट्रोलियम मंत्रालय लगातार खुलासा कर रहा है कि रसोई गैस (एलपीजी) के उत्पादन में 40 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। अपनी जरूरतों की 40 फीसदी एलपीजी का उत्पादन भारत करता ही है। यदि एलपीजी उत्पादन में, 20-22 दिन में ही, इतनी बढ़ोतरी की जा सकती है, तो हम अपनी जरूरतों की 70-80 फीसदी गैस तक पैदा कर सकते हैं! सरकार इस पर स्पष्टीकरण जरूर दे। जब 2014 में भाजपा केंद्र में सत्तारूढ़ हुई थी, तब उसने अपने घोषणा-पत्र में लिखा था कि ऊर्जा-सुरक्षा और उत्पादन में व्यापक सुधार किए जाएंगे। आज स्थिति यह है कि भारत को करीब 88.6 फीसदी कच्चा तेल, 60-66 फीसदी गैस और करीब 65 फीसदी खाद आयात करने पड़ते हैं। स्थिति पहले से बदतर ही हुई है। भारत इतना पराश्रित, मोहताज क्यों है कि युद्ध के कारण एक समुद्री मार्ग बंद किया गया, तो देश में गैस को लेकर ‘हाय-तौबा’ मच गई? भारत का आयात बिल 1,05,000 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। बेशक देश में घरेलू और कमर्शियल एलपीजी का गंभीर संकट है। सरकार भी मानती है कि स्थिति चिंताजनक है। यह बयान मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा का है। एलपीजी की जमाखोरी और कालाबाजारी हमारे संस्कार में है। हम इसे व्यापार का ही हिस्सा मानते रहे हैं। जितने गैस सिलेंडर छापों के दौरान जब्त किए गए हैं, उन ‘काली भेड़ों’ के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई की गई है? उन पर ‘रासुका’ क्यों नहीं लगाया गया?

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