नई दिल्ली: आंखों के आंसू सूख गए थे. 13 साल तक बेटे की सेवा में दिन-रात एक कर दिया. मानसिक पीड़ा से लेकर तमाम वो दिक्कतें झेलीं जो बुजुर्ग पिता को अंदर तक झकझोर दे रहा था. आज अब श्मशान में उनके जिगर का टुकड़ा अब नई यात्रा पर निकल चुका है. बेटे की पीड़ा में आंसुओं का सैलाब बहाने वाले पिता अशोक राणा आज श्मशान घाट पर चुपचाप पथराई आंखों से बेटे का शव देख रहा है. आंखों के आंसू तो कबके सूख गए थे. पर दिल में उमड़ रही पीड़ा शायद लबों पर आ रही होगी. बाप का दिल आज जार-जार रो रहा होगा. अपने जिगर के टुकड़े को आज वो आखिरी बार देख रहा है. 

पिता को ढाढस बंधाते करीबी

पास खड़े लोग अशोक को ढाढस बंधाने की कोशिश कर रहे हैं. पर अशोक की सूखी आंखें शून्य में निहार रही हैं. चेहरे पर दुख साफ दिख रहा है लेकिन आंसू नहीं हैं. क्योंकि जिस हरीश की मुक्ति के लिए वो पिछले 13 साल से अदालतों के चक्कर लगा रहे थे वो अब चैन की नींद सो चुका है. पिछले 13 साल में उन्होंने बेटे की जो पीड़ा देखी उससे अब उन्हें निजात मिल गया है. 

एक पिता के लिए आंखों के सामने बेटे का शव पड़े होने से बड़ा दुख कोई नहीं होता है. लेकिन अशोक राणा ने अपने बेटे को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए ये दुख खुद चुना था. वैसे भी दर्द जब सहने की शक्ति को पार कर जाता है तो उससे मुक्ति पा लेना ही अच्छा होता है. हरीश के पिता ने भी अपने बेटे के लिए सुप्रीम कोर्ट से इसी मुक्ति की मांग की थी. शीर्ष अदालत भी इस बेटे को मुक्ति देने का ही आदेश दिया लेकिन उनके हाथ भी कांप रहे थे. 

श्मशान में अशोक राणा चुप हैं. मुंह से कोई बोल नहीं निकल रहे हैं. पास खड़ी मां जरूर रो रही है. जिसे 9 महीने अपने कोख में रखा आज वो बेटा उनकी आंखों के सामने निर्जीव पड़ा है. कुछ समय बाद उनके पास उसकी केवल यादें ही रह जाएंगी. अशोक अपने इस बच्चे के जाने से दुखी तो जरूर हैं लेकिन उसके कष्ट ने इस पिता को थोड़ा निर्दयी भी बना दिया था. आखिर कौन पिता बिस्तर पर कोमा में पड़े अपने जिगर के टुकड़े को तिल-तिलकर मरते देखना चाहता है. आज बाप के दिल में पीड़ा तो है लेकिन बेटे की मुक्ति उनके लिए जरूरी थी.

Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
March 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031  
Exit mobile version