कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने एक टीवी चर्चा के दौरान दावा किया था कि अमरीकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो पाकिस्तान जा रहे हैं। राजपूत लखनऊ में रहते हैं, लिहाजा पार्टी के क्षेत्रीय प्रवक्ता ही होंगे! उन्हें अमरीकी उपराष्ट्रपति के प्रवास की क्या जानकारी…! लेकिन राजनीतिक दुष्प्रचार ऐसे ही किया जाता है। पाकिस्तान में अमरीकी प्रतिनिधियों को ईरान के समकक्षों या नुमाइंदों से बातचीत करनी थी। पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका में बताया गया था। उस टीवी चर्चा के दौरान लगभग सभी ने भारत की भूमिका पर सवाल उठाए। भारत को अलग-थलग कर दिया गया है, यह विश्लेषण भी सामने आया। पाकिस्तान की मध्यस्थ वाली भूमिका और अचानक बढ़ी हैसियत की तुलना में इसे भारत की गंभीर ‘कूटनीतिक नाकामी’ करार दिया गया। रविवार को यह संपादकीय लिखने तक न तो अमरीका और न ही ईरान ने ऐसी बातचीत की पुष्टि की थी। उपराष्ट्रपति वेंस अब भी अमरीका में ही हैं और ईरान अमरीका के साथ संवाद के लिए फिलहाल मानसिक और रणनीतिक तौर पर तैयार ही नहीं है। फिर मध्यस्थता का औचित्य क्या है? दरअसल कांग्रेस, वामदलों, सपा द्वारा समर्थित टीवी मीडिया पर यह सनसनीखेज चर्चा प्रायोजित लगती है कि राष्ट्रपति टं्रप ने पाकिस्तान के सीडीएफ मुनीर को फोन किया, लिहाजा पाकिस्तान को मध्यस्थ के तौर पर तय कर लिया गया।

राष्ट्रपति टं्रप ने उसी दौर में प्रधानमंत्री मोदी से भी फोन पर बातचीत की थी। प्रधानमंत्री ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से भी बात की थी। खाड़ी देशों के लगभग सभी राष्ट्राध्यक्षों, किंग, शेख, सुल्तान, अमीर आदि से भी बातचीत की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध को खारिज किया था और ऊर्जा ठिकानों पर विनाशक हमलों को स्वीकार्य नहीं माना था। भारत को मध्यस्थ इसलिए नहीं तय किया गया, क्योंकि भारत ऐसी मध्यस्थता के सैद्धांतिक, नीतिगत विरोध में रहा है। पाकिस्तान को ‘अल्लाह’ की मेहरबानी माननी चाहिए कि ईरान ने उस पर मिसाइल, ड्रोन हमले कर उसे मिट्टी-मलबा नहीं किया। ईरान ने अमरीका के प्रत्येक सहयोगी अथवा सैन्य बेस वाले देश पर लगातार हमले कर तबाही मचाई है। पाकिस्तान में मिस्र, तुर्किए, सऊदी अरब के विदेश मंत्री बैठक कर विमर्श कर सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान न तो कभी मध्यस्थ था और न ही यह कूटनीतिक दायित्व उसे दिया जा सकता है। अलबत्ता वह ‘डाकिया’ अथवा ‘संदेशवाहक’ जरूर बन सकता है और मेहनताने के तौर पर उसे कुछ डॉलर दिए जा सकते हैं। पाकिस्तान इसलिए भी अमरीका-ईरान युद्ध में मध्यस्थ नहीं बन सकता, क्योंकि खुद उसकी अफगानिस्तान, टीटीपी, बलूच लड़ाकों के खिलाफ कई स्तर की जंग छिड़ी है। पाकिस्तान के 4000 से ज्यादा फौजी मारे जा चुके हैं और विरोधियों की भी हत्याएं की गई हैं। आम आदमी भी कुचला जा रहा है। ऐसे मध्यस्थ की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता क्या होगी? इसके अलावा, पाकिस्तान आतंकवादी देश है, यह हाल ही में किसी एजेंसी ने निष्कर्ष दिया है। पाकिस्तान कंगाल, भूखा, कटोरे वाला देश है। वहां 45 फीसदी से अधिक मुद्रास्फीति है, जो एक रिकॉर्ड है। मिट्टी के तेल की कीमत 433.40 पाकिस्तानी रुपए प्रति लीटर है। पाकिस्तान पर 100 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है। पाकिस्तान 1958 से आज तक 26 बार आईएमएफ के पास जा चुका है। ऐसी स्थिति में उसे मध्यस्थता के लिए चुनना संभव नहीं है।

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