भोपाल : मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों निगम-मंडलों, प्राधिकरणों और आयोगों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एल्डरमैन की पहली सूची जारी होने के बाद उम्मीद थी कि बाकी नियुक्तियां भी जल्द होंगी, लेकिन मामला अब अंदरूनी खींचतान में उलझता दिख रहा है। सूत्रों की मानें तो सिंधिया समर्थक सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं।

सिंधिया गुट के नाम बने मुख्य वजह

इस रुकावट के पीछे Jyotiraditya Scindia गुट के पांच प्रमुख नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं—

  • इमरती
  • महेंद्र सिंह सिसोदिया
  • ओपीएस भदौरिया
  • गिरीराज डिंडौतिया
  • मुनालाल गोयल

ये सभी वे नेता हैं जिन्होंने सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इन नामों पर सहमति नहीं बन पाने के कारण नियुक्तियों की प्रक्रिया अटक रही है।

दलबदल का “इनाम” या राजनीतिक संतुलन?

सिंधिया का रुख साफ बताया जा रहा है—ये वही नेता हैं जिन्होंने सरकार के संकट के समय पार्टी का साथ दिया, इसलिए इन्हें पद मिलना चाहिए। पहले भी सिंधिया अपने समर्थकों को महत्वपूर्ण पद दिलाने में सफल रहे हैं। लेकिन भाजपा के भीतर संतुलन बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है। पार्टी को पुराने और नए दोनों नेताओं के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है, जिससे निर्णय लेने में देरी हो रही है।

देरी बनी राजनीतिक मुद्दा

राजनीतिक नियुक्तियों में हो रही देरी अब विपक्ष के लिए एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। विपक्ष इसे भाजपा की अंदरूनी खींचतान और असहमति का संकेत बता रहा है। वहीं राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह देरी सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक समीकरणों का परिणाम है—जहां हर गुट अपने प्रभाव और हिस्सेदारी को लेकर सक्रिय है।

आगे क्या?

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा नेतृत्व इस पेच को कैसे सुलझाता है। क्या सिंधिया गुट को पूरी तरह संतुष्ट किया जाएगा, या फिर कोई संतुलित फार्मूला निकलेगा—यही तय करेगा कि राजनीतिक नियुक्तियों की अगली सूची कब और कैसे सामने आएगी।

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