1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में हुए विद्रोह के बाद से, वामपंथी उग्रवाद या नक्सलवाद अक्सर हत्याओं, मुठभेड़ों और हिंसा की खबरों के साथ सुर्खियों में बना रहा है। एक समय ऐसा था जब देश के एक चौथाई से अधिक हिस्से-पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जिसे ‘रैड कॉरिडोर’ कहा जाता था-में नक्सलियों का दबदबा था। जहां सुरक्षा बलों के सदस्यों, नक्सलियों और आम नागरिकों सहित हजारों लोग मारे गए या घायल हुए, वहीं इन क्षेत्रों में, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में विकास कार्य लगभग ठप्प हो गया था। नक्सलियों ने अपनी समानांतर सरकार बना ली थी और वे सड़कों के निर्माण या बुनियादी ढांचे के विकास की अनुमति नहीं देते थे, ताकि सरकार और सुरक्षा बलों को दूर रखा जा सके।

एक लंबी अवधि तक सरकार इस खतरे से लड़ती रही और नक्सलियों के प्रभाव को मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ तक सीमित करने में सफल रही। इस आंदोलन के खिलाफ एक निर्णायक अभियान 2006 में शुरू हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि माओवादी हिंसा ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ है। हालांकि, वर्तमान सरकार द्वारा इसे बड़ा बढ़ावा दिया गया और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च, 2026 तक देश को ‘नक्सल मुक्त’ बनाने की समय सीमा तय की। नक्सली हिंसा से छुटकारा पाने के अपने संकल्प में प्रभावी कदम उठाने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार को श्रेय दिया जाना चाहिए। अमित शाह ने अपनी निर्धारित समय सीमा से एक दिन पहले देश को ‘नक्सल मुक्त’ घोषित करते हुए बताया कि पिछले 3 वर्षों में 4,839 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, 706 मारे गए और 2,218 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

‘‘2024 की शुरुआत में माओवादियों की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में 22 सदस्य थे। आज एक भी नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि नक्सलवाद ‘लगभग खत्म हो चुका है’ और माओवादियों के खिलाफ बल प्रयोग का बचाव करते हुए कहा कि जो गोलियां चलाते हैं, उन्हें गोलियों से ही जवाब दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि नक्सलियों द्वारा इस्तेमाल किए गए 92 प्रतिशत हथियार पुलिस के शस्त्रागार से लूटे गए थे। जहां हिंसा को समाप्त करने के संकल्प के लिए सरकार को श्रेय दिया जाना चाहिए, वहीं केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सी.आर.पी.एफ.) के नेतृत्व में अर्धसैनिक बलों के साथ-साथ संबंधित राज्यों के पुलिस बलों और अन्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सी.ए.पी.एफ्स) जैसे सीमा सुरक्षा बल (बी.एस.एफ.), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सी.आई.एस.एफ.), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आई.टी.बी.पी.) और सशस्त्र सीमा बल (एस.एस.बी.) ने हिंसा से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां तक कि भारतीय सेना और वायुसेना भी नक्सलियों को बाहर निकालने के लिए कुछ ऑप्रेशनों में शामिल हुई। लेकिन इसका श्रेय उन अधिकारियों और श्रमिकों को भी जाता है, जो माओवादियों की धमकियों के बावजूद सड़कें बिछाने और बुनियादी ढांचे के निर्माण में लगे रहे, जिसने अंतत: पासा पलट दिया और माओवादियों ने जंगलों में अपना समर्थन खो दिया।

मडवी हिडमा, नंबला केशव राव, गणेश उइके, सत्यनारायण रेड्डी और रामचंद्र रेड्डी जैसे शीर्ष माओवादी नेताओं के मुठभेड़ों में मारे जाने और मल्लो जुला वेणुगोपाल राव, देवा बरसे और देवूजी जैसे नेताओं के आत्मसमर्पण ने माओवादियों के नेतृत्व को लगभग समाप्त कर दिया है। अब केवल दो शीर्ष नेता-मुप्पला लक्ष्मण राव (गणपति) और मिसिर बेसरा (सागर) का आत्मसमर्पण करना बाकी है। सुरक्षा बलों का मानना है कि वे जल्द ही ऐसा कर देंगे। हालांकि, सुरक्षा बलों की इस सफलता के बाद, अब नागरिक सरकार की बारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि स्थिति फिर से न बिगड़े। नक्सलवाद के पुनरुत्थान को रोकने के लिए, सरकार को प्रभावित क्षेत्रों में समावेशी विकास, बुनियादी ढांचे के विकास और रोजगार के अवसरों को सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उसे स्थानीय संस्थानों को मजबूत, कानून-व्यवस्था में सुधार और भ्रष्टाचार को दूर करना चाहिए।

एक अन्य महत्वपूर्ण उपाय आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों को सहायता प्रदान करना होगा, जिसमें व्यावसायिक प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता शामिल है। साथ ही, सरकार अपनी सतर्कता कम नहीं कर सकती और उसे नक्सली गतिविधियों को रोकने के लिए निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमता को बढ़ाना चाहिए। हिंसा और शासन की कमी के कारण 6 दशकों से अधिक समय तक आम जनता ने जो कष्ट सहे हैं, उसकी भरपाई सुरक्षा, विकास और सुशासन के बहुआयामी दृष्टिकोण को अपना कर ही की जानी चाहिए।-विपिन पब्बी

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