नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने प्रदेश की भजनलाल शर्मा सरकार और न्याय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए. जूली ने राजस्थान की लाखों गरीबों और मध्यमवर्गीय परिवारों का पैसा हड़पने वाले बहुचर्चित आदर्श क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी घोटाले में राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) की भूमिका पर सवाल उठाया है. उन्होंने कहा है कि राजस्थान की भाजपा सरकार, डबल इंजन सरकार एक वकील को डबल रोल में रखकर लाखों गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के साथ अन्याय कर रही है.

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि वर्ष 1999 में मुकेश मोदी और उनके परिवार द्वारा शुरू की गई इस सोसाइटी ने 2010 से 2014 के बीच करीब 22 लाख मासूम लोगों से 15,000 करोड़ रुपये की ठगी की. जांच में सामने आया कि लगभग 125 फर्जी (शैल) कंपनियों के माध्यम से जनता का पैसा मोदी परिवार के सदस्यों और उनके करीबियों तक पहुँचाया गया. 2018 में SOG की FIR के बाद गिरफ्तारियां तो हुईं, लेकिन आज न्याय की उम्मीद पर सरकार के वकील ही पानी फेर रहे हैं.

आरोपी का वकील ही बना सरकार का वकील- नेता प्रतिपक्ष

जूली ने बताया कि अन्य आरोपियों के अतिरिक्त इसमें एक आरोपी सिद्धार्थ चौहान भी शामिल है. बताया कि राजस्थान सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस केस की पैरवी कर रहे AAG शिवमंगल शर्मा और उनकी लॉ फर्म ‘ऑरा एंड कंपनी’ का इस घोटाले के आरोपियों के साथ गहरा संबंध है. 

उन्होंने बताया कि इसी घोटाले में दो और मुकदमे गुड़गांव एवं दिल्ली में चल रहे है. इन मुकदमों में सिद्धार्थ चौहान सह आरोपी है एवं अभी तक फरार होने के कारण भगौड़ा घोषित किया जा चुका है. इस आरोपी सिद्धार्थ चौहान के दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमे में आरोपी की ओर से लॉ फर्म लिए “ऑरा एंड कंपनी” नियुक्त है जो वकील शिवमंगल शर्मा, सौरभ राजपाल, निधि जायसवाल तथा इनके साथियों की फर्म है.

उन्होंने सवाल उठाया, “यह कैसे संभव है कि एक तरफ वही वकील दिल्ली में घोटाले के आरोपी को बचाने की पैरवी कर रहे हैं और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान सरकार की ओर से पीड़ितों का पक्ष रखने का ढोंग कर रहे हैं? यह सीधे तौर पर ‘हितों के टकराव’ का मामला है और पैसा गँवा चुके निवेशकों की आंखों में धूल झोंकना है.”

‘न्यायिक मर्यादाओं और बार काउंसिल नियमों की धज्जियां’

जूली ने कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया का नियम 33 स्पष्ट रूप से किसी भी वकील को विरोधी हितों वाले पक्षों के लिए कार्य करने से रोकता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘चंद्र प्रकाश त्यागी बनाम बनारसी दास’ मामले में व्यवस्था दी है कि वकील और क्लाइंट का संबंध विश्वास पर टिका होता है. जब वकील के पास दोनों पक्षों की गोपनीय जानकारियां हों, तो न्याय की निष्पक्षता खत्म हो जाती है.

जूली ने कहा कि एक ही घोटाले से जुड़े मामलों में एक वकील दिल्ली हाईकोर्ट में सह-आरोपी की पैरवी कर रहा हो और वहीं सुप्रीम कोर्ट में उसी प्रकरण से जुड़े राज्य पक्ष (SOG केस) में राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) के रूप में उपस्थित हो, तो यह स्थिति स्पष्ट रूप से दोनों पक्षों के हितों का प्रतिनिधित्व करने की श्रेणी में आती है.

नेता प्रतिपक्ष ने की उच्च स्तरीय जांच की मांग

नेता प्रतिपक्ष ने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि क्या अधिवक्ता शिवमंगल शर्मा और ‘ऑरा लॉ फर्म’ ने राजस्थान सरकार को यह जानकारी दी थी कि वे इसी घोटाले के सह-आरोपी के वकील के रूप में भी कार्य कर रहे हैं? यदि सरकार को इस तथ्य की जानकारी दी गई थी, तो फिर ऐसे ‘हितों के टकराव’ वाले वकील को राज्य का पक्ष रखने के लिए नियुक्त करना पीड़ितों के साथ सरासर धोखा है.

उन्होंने कहा कि यदि वकील द्वारा यह जानकारी छिपाई गई, तो क्या राजस्थान सरकार अब उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई और प्रोफेशनल मिसकंडक्ट का मामला दर्ज करने का साहस दिखाएगी? इन सवालों का जवाब न मिलना यह साबित करेगा कि सरकार की मिलीभगत से 22 लाख निवेशकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है.

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