नई दिल्ली: भारत के अंतरिक्ष मिशन लॉन्च के समय भले ही सुर्खियां बटोरते हों, लेकिन उनकी असली परीक्षा तो रॉकेट के शांत हो जाने के बाद ही शुरू होती है। इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन ने यह बात कही है। उन्होंने कहा कि मिशन ऑपरेशंस वह लंबा और अदृश्य चरण है, जो उपग्रहों को सालों तक जीवित रखता है। इससे देश की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं के अगले चरण को परिभाषा मिलती है।

स्पेसक्राफ्ट मिशन ऑपरेशंस (SMOPs) कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए नारायणन ने इस बात पर जोर दिया कि जहां लॉन्च में मुश्किल से 15 से 25 मिनट लगते हैं, वहीं स्पेसक्राफ्ट को सालों तक, कभी-कभी 15 साल तक विश्वसनीय रूप से काम करना होता है। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना कि स्पेसक्राफ्ट ऑर्बिट में पूरी तरह से काम करता रहे, इसके लिए लगातार मॉनिटरिंग, सिमुलेशन और कमांड ऑपरेशंस की जरूरत होती है। यह एक बहुत ही अहम क्षेत्र है।

प्रोजेक्ट में देरी पर हो रही आलोचना

नारायणन ने ऐसे समय में यह बात कही है, जब ISRO लॉन्च की असफलताओं और प्रोजेक्ट में देरी की वजह से मुश्किलों का सामना कर रहा है और इस वजह से संस्थान की काफी आलोचना भी हुई है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम मील के पत्थर वाले मिशनों से हटकर लगातार चलने वाली अंतरिक्ष गतिविधियों की ओर बढ़ रहा है।

गलत कमांड का नतीजा बेहद बुरा

नारायणन ने पिछली SMOPs कॉन्फ्रेंस के बाद से तीन बड़ी उपलब्धियों की ओर इशारा किया। अंतरिक्ष में सफल डॉकिंग प्रयोग, चंद्रयान-3 की चांद पर लैंडिंग, और आदित्य-L1 सोलर मिशन। उन्होंने डॉकिंग प्रयोग को खास तौर पर मुश्किल बताया, जिसमें 15,000 kmph से ज्यादा की रफ्तार से चल रहे दो सैटेलाइट्स को पूरी सटीकता के साथ एक-दूसरे के करीब लाया गया। उन्होंने इसमें शामिल जोखिमों पर जोर देते हुए कहा कि कोई भी गलत कमांड आप जानते हैं कि इसका नतीजा क्या होगा।

टीम को दिया कामयाबी का श्रेय

चंद्रयान-3 के संबंध में नारायणन ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट एक स्वायत्त लैंडिंग अनुक्रम को सफलतापूर्वक पूरा करने का श्रेय मिशन संचालन टीमों को दिया। उन्होंने सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य-L1 मिशन के साथ, भारत के उन चुनिंदा देशों के विशिष्ट समूह में शामिल होने का भी उल्लेख किया।

AI और मशीन लर्निंग हो जाएंगी जरूरी

इसरो चेयरमैन ने इस बात पर जोर दिया कि मिशन के ऑपरेशन सिर्फ एक टीम तक ही सीमित नहीं होते, बल्कि इनमें डिजाइनर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर और सिस्टम स्पेशलिस्ट मिलकर काम करते हैं। उन्होंने उनकी भूमिका को ‘बहुत अहम’ बताया और कहा कि अक्सर इसे उतनी पहचान नहीं मिलती जितनी मिलनी चाहिए। भविष्य की बात करते हुए नारायणन ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और क्लाउड-आधारित ग्राउंड सिस्टम जैसी टेक्नोलॉजी बहुत जरूरी हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि जो चीजें 10 से 15 साल पहले बहुत एडवांस मानी जाती थीं, वे अब आज के समय की जरूरत बन गई हैं।

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