निश्चित रूप से भारत के पास बदलते हुए दौर में उच्च शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनने के अवसर मौजूद हैं। इसे मुठ्ठी में करने के लिए रणनीतिक रूप से और तेजी से आगे बढऩा होगा। देश को शिक्षा के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों जैसे क्षेत्रों में तेजी से उन्नत कौशल विकसित करने की रणनीति अपनाना होगी…

यकीनन यह सुकूनदेह परिदृश्य है कि भारत में उच्च अध्ययन के लिए विदेशों से आने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस समय भारत एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शिक्षा गंतव्य देश बनने की ओर अग्रसर है। हाल ही में वैश्विक उच्च शिक्षा सेवाओं का मूल्यांकन करने वाली ख्याति प्राप्त अग्रणी कंपनी ब्रिटेन स्थित क्यूएस क्वाक्वेरेली साइमंड्स द्वारा प्रकाशित 16वीं वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में वल्र्ड यूनिवर्सिटी की रैंकिंग में भारतीय शैक्षणिक संस्थानों का अभूतपूर्व प्रदर्शन रहा है। भारत ने इस साल विभिन्न विषयों और संकाय क्षेत्रों में शीर्ष 50 में से 27 स्थान हासिल किए हैं, जो कि पिछले वर्ष 2024 में दर्ज किए गए 12 स्थानों की तुलना में दोगुने से भी अधिक हैं। साथ ही वर्ष 2030 तक भारत आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में हर साल लगभग आठ प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी का अनुमान है। गौरतलब है कि जहां वर्ष 2022 में 39 हजार से अधिक विदेशी छात्र भारत आए थे, वहीं वर्तमान में लगभग 200 देशों के 72 हजार से अधिक विदेशी छात्र भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में अध्ययनरत हैं। अब केंद्र सरकार ने ‘स्टडी इन इंडिया’ पहल के तहत 2030 तक प्रतिवर्ष 2 लाख विदेशी छात्रों को आकर्षित करने का लक्ष्य रखा है। यह संकेत है कि सरकार भारत को केवल प्रतिभाओं की आपूर्तिकर्ता के रूप में नहीं, वरन वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करने की राह पर आगे बढ़ रही है।

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अब हर साल बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण कौशल, अनुसंधान सुविधाओं और उच्च शिक्षा के बाद विदेश में ही करियर के अवसरों को पाने के मद्देनजर विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या लगातार घट रही है। हाल ही में संसद में बताया गया कि वर्ष 2023 में 9.08 लाख भारतीय छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए गए थे, वर्ष 2024 में यह संख्या गिरकर 7.7 लाख पर आ गई और वर्ष 2025 में यह संख्या और घटकर 6.26 पर पहुंच गई। नि:संदेह भारत में वर्ष-प्रतिवर्ष उच्च शिक्षा के लिए आने वाले विदेशी छात्रों की बढ़ती संख्या और भारत से उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में कमी के कई कारण हैं। सरकार ने पिछले कुछ सालों में उच्च शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने के कई कदम उठाए हैं। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) 2020 के जरिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार किए गए हैं। एनईपी के तहत एजुकेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड करने, मान्यता देने की व्यवस्था मजबूत करने, रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देने और डिजिटल एजुकेशन का विस्तार करने का अभियान लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। उच्च शिक्षा में ऐसे गुणात्मक सुधार से भारत के शिक्षा संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक मान्यता मिल रही है। यही कारण है कि क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में भारतीय संस्थानों की संख्या 2014-15 के मात्र 11 से बढक़र नवीनतम संस्करण में 54 हो गई है। वैश्विक स्तर की शिक्षा व्यवस्था को भारत में लाने के मद्देनजर 19 विदेशी यूनिवर्सिटीज को भारत में कैंपस स्थापित करने की इजाजत दी गई है। इससे जिस वैश्विक शिक्षा के लिए पहले छात्रों को विदेश जाना पड़ता था, अब वही शिक्षा आसानी से भारत में ही मिलने की व्यवस्था सुनिश्चित हुई है। निश्चित रूप से विदेशी यूनिवर्सिटीज को भी भारत में बड़ी संख्या में छात्र मिलने का लाभ है। भारत में उच्च शिक्षा की मांग में तेजी से वृद्धि हो रही है। इस समय उच्च शिक्षा में छात्रों की जो संख्या 4.46 करोड़ से अधिक है, वह बढक़र 2035 तक 8.6 करोड़ से अधिक होने की उम्मीद है। चूंकि वैश्विक यूनिवर्सिटीज भारत में डिग्री प्रदान कर सकती हैं, अतएव छात्रों के लिए विदेश जाने के खर्च और अनिश्चितताओं के बिना अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भारत में ही लेना लाभप्रद है। इतना ही नहीं भारतीय छात्रों के लिए शिक्षा के प्रमुख गंतव्य देश, खासकर अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में आव्रजन नियमों में सख्ती आई है और वीजा जांच के अलावा वित्तीय लागत बढ़ गई है। हाल ही में अमरीकी गृह सुरक्षा विभाग के द्वारा रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक साल के भीतर भारतीय छात्रों के ग्राफ में बड़ी गिरावट आई है।

फरवरी 2025 में अमरीका में विभिन्न पाठ्यक्रमों में 378787 भारतीय छात्र अध्ययनरत थे। फरवरी 2026 में यह संख्या घटकर 352644 रह गई। गिरावट का स्तर : केवल 12 महीनों में करीब 26143 छात्रों की कमी आई है, जो लगभग 6.9 प्रतिशत की गिरावट है। इसका असर भारत के छात्रों पर अधिक पड़ा है और अमरीका जाने वाले छात्रों की संख्या में तेज गिरावट आई है। इतना ही नहीं, अमरीका में जो छात्र अध्ययनरत हैं, उनके लिए भी रोजगार ढूंढना मुश्किल हो गया है। केवल अमरीका ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया ने भी भारतीय छात्रों के लिए अपनी दहलीज ऊंची कर दी है। 8 जनवरी 2026 से ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने भारतीय आवेदकों के लिए साक्ष्य आवश्यकता स्तर को ‘ईएल 2’ से संशोधित करके ‘ईएल 3’ कर दिया है। ईएल 3 श्रेणी का अर्थ है कि भारत अब ऑस्ट्रेलिया के लिए ‘उच्चतम जोखिम’ वाले देशों की सूची में है। अब हर छात्र के आवेदन की सूक्ष्मता से जांच की जाएगी। अब छात्रों को अपनी वित्तीय क्षमता और शैक्षणिक रिकॉर्ड के अधिक कड़े प्रमाण देने होंगे। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि सरकार हरसंभव तरीके से भारत को वैश्विक शिक्षा व डिजिटल शिक्षा का केंद्र बनाने के लिए प्रयास कर रही है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट के तहत शिक्षा व्यवस्था के विभिन्न आवंटनों को वैश्विक शिक्षा और अर्थव्यवस्था की वास्तविक जरूरतों के मद्देनजर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई), इनोवेशन, ऑटोमेशन, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल बिजनेस से संबद्ध करने संबंधी प्रभावी पहल की गई है।

निश्चित रूप से भारत के पास बदलते हुए दौर में उच्च शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनने के अवसर मौजूद हैं। इसे मुठ्ठी में करने के लिए रणनीतिक रूप से और तेजी से आगे बढऩा होगा। देश को शिक्षा के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों जैसे क्षेत्रों में तेजी से उन्नत कौशल विकसित करने की रणनीति अपनाना होगी। देश में वैश्विक शिक्षा को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण बनाकर खासतौर से एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया सहित कई विकसित और विकासशील देशों के छात्रों के कदम भारत की यूनिवर्सिटीज की ओर मोडऩे के लिए प्रयास करने होंगे। भारत को इंजीनियरिंग, प्रबंधन, स्वास्थ्य विज्ञान, डिजाइन, मीडिया और उभरती प्रौद्योगिकियों की वैश्विक शिक्षा का हब बनाने के विशेष प्रयत्न करने होंगे। देश में विदेशी परिसरों को आकर्षित करने के मद्देनजर भारतीय यूनिवर्सिटियों की रैंकिंग को और ऊंचाई पर पहुंचाना होगा। इन सबके साथ-साथ सरकार के द्वारा उच्च शिक्षा और डिजिटल शिक्षा पर निवेश बढ़ाना होगा। उम्मीद करें कि सरकार वैश्विक शिक्षा के बदलते हुए गंतव्य देशों के परिप्रेक्ष्य में भारत को वैश्विक शिक्षा का नया हब बनाने के लिए भारत को एआई तथा भविष्य की टेक्नोलॉजी पर आधारित वैश्विक और डिजिटल शिक्षा का ऐसा सस्ता और गुणवत्तापूर्ण हब बनाने की राह पर आगे बढ़ेगी, जिससे भारत से उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में और कमी आए तथा विदेश से उच्च शिक्षा के लिए भारत आने वाले छात्रों की संख्या में और वृद्धि हो। भारत को शिक्षा के हब के रूप में विकसित करना होगा। शिक्षा में गुणवत्ता लाने से लक्ष्य पूरा होगा।-डा. जयंती लाल भंडारी

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