कोलकाता: डायमंड हार्बर रोड पर दौड़ती पीली टैक्सियों का शोर, तारातला मोड़ पर तली जा रही गरमा-गरम ‘फिश फ्राई’ की खुशबू, पार्क में फुटबॉल खेलते पसीना बहाते बच्चे और हर नुक्कड़ पर बने पत्थर के चबूतरों पर होती गपशप… यह बेहाला है। कोलकाता का वह हिस्सा, जो आधुनिकता के साथ अपनी विरासतों को संभाले हुए है। ये वही इलाका है, जिसमें सबसे बड़े और पुराने जमींदार सबर्णा रॉय चौधरी और ‘प्रिंस ऑफ कोलकाता’ कहे जाने वाले सौरव गांगुली का घर है।

हालांकि इस बार बेहाला पूर्व के ‘अड्डों’ यानी गप्पें मारने के ठिकानों, में क्रिकेट या सिनेमा नहीं, बल्कि 29 अप्रैल को होने वाला महासंग्राम चर्चा में है। 2026 की यह चुनावी जंग अब यहां के ऊंचे अपार्टमेंट्स से लेकर ठाकुरपुकुर की तंग गलियों तक पहुंच चुकी है।

दीदी की लक्ष्मी भंडार बनाम मोदी की गारंटी

बेहाला की सड़कों पर जब नवभारतटाइम्स.कॉम की टीम ने एक ई-रिक्शा (टोटो) की सवारी की, तो ड्राइवर सुबल दा ने बड़े पते की बात कही। हाथ में बीड़ी दबाते हुए बोले, ‘देखिए दादा, दिल्ली वाला मोदी जी गारंटी तो खूब देता है, पर हमारा रसोई का डब्बा तो दीदी का ‘लक्ष्मी भंडार’ ही भर रही है।’

यह सिर्फ सुबल दा की बात नहीं है। बेहाला की गलियों में दीवारों पर जहां एक तरफ ‘जोड़ा फूल’ यानी TMC का निशान अपनी योजनाओं का बखान कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी एआई और सड़कों पर पर्चे बांटकर भ्रष्टाचार की पोल खोल रही है। दिलचस्प बात यह है कि बेहाला का मूल बंगाली मानुस जहां तृणमूल के साथ मजबूती से खड़ा दिखता है, वहीं यहां बसे यूपी-बिहार मूल के प्रवासी वोटरों के बीच ‘एई बार पोरिबोर्तन होई’ की गूंज साफ सुनाई देती है।

भगवा लहर आएगी या तृणमूल का अभेद्य किला बना रहेगा?

इतिहास की बात करें तो बेहाला कभी वामपंथियों का गढ़ था, जिसे ममता बनर्जी ने 2011 में ढहा दिया। लेकिन अब यहां का समीकरण बदल रहा है। 2011 में महज 1.91% वोट पाने वाली बीजेपी 2024 के लोकसभा ट्रेंड्स में 38.07% तक पहुंच चुकी है। दूसरी ओर टीएमसी की रत्ना चटर्जी ने 2021 में 37 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ और ‘कट-मनी’ के आरोपों ने लड़ाई को नजदीकी बना दिया है। इस सीट की सबसे बड़ी समस्या वोटर्स की उदासीनता है। 2016 में जहां 73% मतदान हुआ था, वह 2024 में गिरकर 68.59% रह गया।

किसके पास क्या है दांव पर?

सुभाशीष चक्रवर्ती (TMC): पूर्व राज्यसभा सांसद और पेशे से वकील। टीएमसी ने रत्ना चटर्जी का पत्ता काटकर यहां से सुभाशीष को उतारा है। वे संगठन के पुराने खिलाड़ी हैं और उनकी चुनौती अपनी पार्टी के भीतर की गुटबाजी को रोककर ममता की गारंटी (लक्ष्मी भंडार) को वोटों में तब्दील करना है।

शंकर सिकदार (BJP): बीजेपी ने यहां सुनील महाराज का टिकट काटकर शंकर सिकदार को मौका दिया है। शंकर संगठन के पुराने सिपाही हैं। बीजेपी के लिए वे उस ‘साइलेंट एंगर’ का चेहरा हैं जो टीएमसी के सिंडिकेट राज और भ्रष्टाचार के खिलाफ मध्यम वर्ग में पनप रहा है।

डॉ. निलॉय मजूमदार (CPI-M): लेफ्ट ने एक डॉक्टर बाबू पर दांव खेलकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। डॉ. मजूमदार की साफ-सुथरी छवि उन मतदाताओं को अपनी ओर खींच रही है जो टीएमसी की कट-मनी और बीजेपी की ध्रुवीकरण वाली राजनीति से दूरी बनाना चाहते हैं।

आज भी ट्रेंड में है ट्रेडिशनल प्रचार माध्यम

बेहाला पूर्व में प्रचार का तरीका अनोखा है। एक तरफ घरों की दीवारों पर हाथ से लिखे पारंपरिक चुनावी नारे हैं, तो दूसरी तरफ स्मार्टफोन पर एआई जनरेटेड वीडियो का तांडव। बीजेपी ने अपने पर्चों में साफतौर पर लिखा है ‘टीएमसी के 15 साल, बदहाल पश्चिम बंगाल।’ इन पर्चों पर संदेशखाली से लेकर शिक्षक भर्ती घोटाले और ‘सिंडिकेट राज’ तक कई मुद्दों का जिक्र है।

स्थानीय समस्याएं बड़ा मुद्दा नहीं

बेहाला पूर्व में स्थानीय समस्याओं को लेकर लोग उदासीन ही हैं। यहां गलियों में जलभराव की समस्या है। जोका-एस्प्लेनेड मेट्रो का काम कछुआ गति से चल रहा है। डायमंड हार्बर रोड पर जाम के अब लोग आदी हो चुके हैं। बीजेपी इसे प्रशासनिक विफलता कहती है, तो टीएमसी के कार्यकर्ता इसे केंद्र द्वारा फंड रोकने का नतीजा बताते हैं। आर्थिक रूप से यह क्षेत्र छोटे व्यापारियों और सर्विस सेक्टर पर टिका है, लेकिन बेरोजगारी के कारण युवाओं का पलायन एक ऐसा दर्द है जो चुनाव में वोट के जरिए रिस सकता है।

सुभाशीष चक्रवर्तीTMCसांगठनिक पकड़, लक्ष्मी भंडारगुटबाजी और एंटी-इंकम्बेंसी
शंकर सिकदारBJPमोदी लहर, प्रवासी वोटर्सस्थानीय चेहरा होने का दबाव
डॉ. निलॉय मजूमदारCPI(M)ईमानदार छवि, न्यूट्रल वोटर्ससंगठन का सिमटता आधार

अब 4 मई का है इंतजार

बेहाला पूर्व में मुकाबला सिर्फ दो पार्टियों के बीच नहीं है। यहां त्रिकोणीय मुकाबला है। एक वर्ग है, जो टीएमसी का कोर वोटर है। दूसरा बीजेपी का वोटर है, जो बदलाव की मांग कर रहा है। यहां CPI(M) ने डॉक्टर साहब को उतारकर मामले को त्रिकोणीय बना दिया है। देखना होगा कि यह इलाका फिर से दीदी का साथ देगा, या इस बार बेहाला के तालाब में कमल खिलेगा? फैसला 29 अप्रैल की वोटिंग और 4 मई की गिनती तय करेगी।

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