देवी मां सरस्वती
 को शायद ही किसी ने देखा, सुना और अनुभव किया होगा, लेकिन कुछ पीढिय़ों ने मां सरस्वती के दो चेहरे देखे हैं। दो प्रतिमाएं और दो प्रतिकृतियां न केवल देखी हैं, बल्कि उनकी सुर-साधना, अप्रतिम, खूबसूरत गायकी की साक्षी भी रही हैं। मां सरस्वती का एक चेहरा लता मंगेशकर थीं, जिनके लिए कोई भी उपमा, रूपक या विशेषण बहुत छोटे हैं। लता जी वाकई ‘भारत-रत्न’ थीं। देवी मां का दूसरा चेहरा आशा भोंसले का है, जो पार्थिव रूप से हमें छोड़ कर चली गई हैं। आशा जी अपनी बड़ी बहन और संगीत की वटवृक्ष लता मंगेशकर की न तो छाया थीं, न ही विकल्प थीं, बल्कि खुद एक संस्थान थीं। मां सरस्वती ने उन्हें ऐसी आवाज, खनक, लोच, चंचलता, बालपन, शोखियां, रोमांस, मुर्कियां बख्शी थीं, जो दुर्लभ थीं और आज तो ऐसी बहुमुखी प्रतिभा की कल्पना तक नहीं की जा सकती। यह बात लता जी ने भी एक साक्षात्कार में कही थी कि दूसरी लता हम सबके सामने आ सकती है, लेकिन दूसरी आशा पैदा नहीं हो सकती। निश्चित रूप से आशा जी की गायकी वहीदा रहमान, आशा पारेख के लिए भी थी, तो हेलन, बिंदु, अरुणा ईरानी सरीखी नृत्यांगनाओं और कुछ खलनायक किरदारों के लिए भी थी। उन्होंने ‘उमराव जान’ में रेखा के लिए जो $ग•ालें गाईं, वह आशा जी के गायन-हुनर का एक अनूठा आयाम था। उस गायकी ने सभी को चौंका दिया कि आशा जी इतने ठहराव के गाने भी गा सकती हैं, लिहाजा उस फिल्म के लिए उन्हें पाश्र्व गायिका के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ये सम्मान तो आशा जी पेशेवर पहचान का एक हिस्सा मानती थीं, लेकिन भारत में और विदेशों में न जाने कितनी पीढिय़ां उनके गीत सुनते, गुनगुनाते जवान हुईं, बूढ़ी भी हो गईं और ‘इंडियन आयडल’ के मंच पर किशोर-युवा पीढ़ी आज भी उनके गीत शिद्दत से गा रही है। यह है हुनर का अमरत्व, निरंतरता और चिरंतनता! ऐसा लगता है, आशा जी पर कोई दैवीय कृपा थी, जो वह 90 साल की उम्र तक गाती रहीं, कंसर्ट करती रहीं। उनके करीब आठ दशक के करियर में उन्होंने 20 देसी-विदेशी भाषाओं में 12,000 से अधिक गीत गाए। उन्हें सबसे अधिक रिकॉर्ड किए गए गायक के तौर पर ‘गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉड्र्स’ में दर्ज किया गया।

बेशक यह अतुलनीय, अभूतपूर्व सम्मान था। उन्हें सिनेमा में गायकी के अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने सर्वोच्च ‘दादा फाल्के सम्मान’ से नवाजा। भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से भी अलंकृत किया। दो राष्ट्रीय पुरस्कार और 9 ‘फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गायिका’ के सम्मान भी मिले। महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया, लेकिन आशा जी हमेशा मानती रहीं कि जो जनता उनके गाने सुनती, गुनगुनाती है और भर-भर कर प्यार देती है, वह ही सर्वश्रेष्ठ और विराट सम्मान है। बहरहाल आज पार्थिव रूप से वह हमारे बीच नहीं रहीं। अब उनका हंसता, मुस्कुराता, अठखेलियां करता, कुछ ठुमके लगाता व्यक्तित्व साक्षात हमारे सामने नहीं होगा, लेकिन कलाकार तो ‘चिरंजीवी’ होता है। वह अपनी कला के जरिए जीवंत और प्रासंगिक बना रहता है। अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत याद आ रही है, जिसका अनुवाद यह हो सकता है-हे मौत! तू इतना गुरूर मत कर। मैं अपनी कला में सदैव जिंदा रहूंगा। बहरहाल आज आशा जी के कुछ पुराने, सदाबहार, हिट गानों की पंक्तियां याद आ रही हैं। उन्हीं में से एक गीत के आधार पर हमने अपने संपादकीय का शीर्षक तय किया है। हम हमेशा उन गानों को गुनगुनाएंगे। याद रखेंगे कि आशा जी को ‘अंतरराष्ट्रीय ग्रैमी अवार्ड’ के लिए भी नामांकित किया गया था। याद करते रहेंगे कि जिन बेटियों के पिता बहुत बचपन में ही गुजर गए, उन्होंने रोजी-रोटी के लिए कितना संघर्ष किया होगा! अंतत: आसमान छुए। आशा जी ऐसी गायिका थीं, जिन्होंने ओपी नैयर के साथ-साथ रोशन, मदनमोहन, खय्याम, कल्याण जी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और नए अंदाज के संगीतकारों के साथ काम किया। हर भाव के गाने गाए। हम उस मखमली एहसास, प्रयोगधर्मी आवाज, पाश्चात्य गायन को कभी भूल नहीं सकते। आशा जी को विनम्र श्रद्धांजलि। इसी बीच उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग जुटे, कई नामी चेहरों ने भी शिरकत की और उन्हें आदरांजलि दी। अब आशा जी अपने गानों में अमर रहेंगी।

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