भारतीय इलाकों के नाम बदलने की हरकतें तो चीन लगातार कर ही रहा है लेकिन इस बार उसने फिर एक और हरकत की है. लद्दाख सीमा के पास उसने एक नई एडमिनिस्ट्रेटिव काउंटी स्थापित की है. काउंटी को सामान्य भाषा में जिला कह सकते हैं. यह काउंटी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान सीमा के पास है. इसके अलावा दो अन्य काउंटी भी बनाई है जिसमें चीन ने अपने कब्जे वाले भारतीय इलाके को शामिल किया है. स्वाभाविक रूप से भारत ने इसे चीन की ओछी हरकत बताया है और साफ कहा है कि इस तरह की हरकतें द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों को कमजोर करती हैं.
भारत ने साफ कहा है कि अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन समेत ये स्थान भारत का अभिन्न हिस्सा थे, हैं और हमेशा रहेंगे.
पिछले डेढ़ वर्षों में चीन ने तीसरी बड़ी प्रशासनिक घोषणा की है. इसके पहले वह अरुणाचल प्रदेश के शहरों का नाम भी अपने मैप में बदलता रहा है. न केवल शहर बल्कि कई इलाकों, पहाड़ और नदियों के नाम भी वह बदल चुका है. 2017, 2021, 2023, अप्रैल 2024 और मई 2025 में भी चीन ने नाम बदलने की हरकतें की थीं और तब भी भारत सरकार ने इसका सख्त विरोध किया था. अब सवाल पैदा होता है कि चीन इस तरह की हरकतें करता क्यों है? इससे क्या बदल जाएगा?
सतही तौर पर देखें तो चीन की ये हरकतें बचकाना और शरारतपूर्ण नजर आती हैं लेकिन आप मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह समझ में आता है कि चीन मनोवैज्ञानिक दबाव डालना चाहता है. वह इस सोच पर काम कर रहा है कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह झूठ भी सच जैसा लगने लगता है. मगर चीन यह भूल जाता है कि भारत के खिलाफ उसका यह मनोवैज्ञानिक दबाव काम नहीं करने वाला है. भारत हर बार चीन को सख्ती से याद दिलाता है कि तुम जो कर रहे हो, वह ओछी हरकत है.
हां, नाम बदलने की हरकतों के बाद ये काउंटी बनाने की जो हरकत उसने की है, वह उसकी साम्राज्यवादी नीति का हिस्सा है. वह बार-बार यह साबित करना चाहता है कि भारतीय हिस्सा उसका है. मगर यह तय है कि उसकी दाल नहीं गलने वाली है. उसे मुगालता नहीं पालना चाहिए. यह 1962 का भारत नहीं है कि अपनी रक्षा न कर पाए.

