भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी की चेतावनी है कि यदि परिसीमन के भरोसे रहे, तो 2034 के आम चुनाव तक महिला आरक्षण कानून लागू हो पाएगा। यदि महिलाओं को राजनीतिक और नीति-निर्धारण में भागीदारी देनी है, तो 50 फीसदी के फॉर्मूले के आधार पर उतनी ही सीटें आवंटित की जा सकती हैं। मसलन-भाजपा-एनडीए को चुनाव में जो जनादेश प्राप्त हुआ था, उसके मुताबिक लोकसभा में उनकी कुल 292 सीटें हैं। उसमें 50 फीसदी, यानी 146, सीटें जोड़ कर उन सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता है। इसी तरह विपक्ष की 233 सीटों में 116 सीटें और जोड़ी जा सकती हैं। चूंकि संशोधन बिल के मुताबिक, लोकसभा में 543 से बढ़ कर 815 सीटें हो जाएंगी और 33 फीसदी महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यानी सदन में 273 महिलाएं सांसद बनकर आ सकेंगी। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का आकलन है कि जो जनगणना शुरू हुई है, वह 2027 तक जारी रहेगी। उसके नतीजे आने और संकलित होने में इतना वक्त खर्च होना मुमकिन है कि 2029 के आम चुनाव करीब खड़े दिखाई देंगे। यदि 2011 की 121 करोड़ से अधिक जनसंख्या के आधार पर परिसीमन तय किया गया है या किया जाना है, तो वह बुनियादी तौर पर विसंगत होगा, समानुपाती नहीं होगा, क्योंकि देश की मौजूदा आबादी 147.66 करोड़ से अधिक है। क्या दोनों जनगणनाओं में अंतर नहीं है? क्या पुरानी जनसंख्या के आधार पर मौजूदा आबादी के विकास, विस्तार, भौगोलिक बदलावों का परिसीमन किया जा सकता है? परिसीमन सरकार की मनमर्जी के मुताबिक नहीं होना चाहिए। बेशक परिसीमन आयोग सर्वोच्च अदालत के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित होता है और उसके निष्कर्षों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। फिर भी आयोग की रपट पर पहले संसद की स्वीकृति अनिवार्य है और फिर राष्ट्रपति की मुहर अंतिम निर्णय है। देश के जम्मू-कश्मीर और असम के कुछ मामले, परिसीमन के बाद, सामने आए हैं, जो इतने असंतुलित और असमान हैं कि परिसीमन की ईमानदारी पर ढेरों सवाल और संदेह किए जा सकते हैं। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर जो संविधान संशोधन लोकसभा में पेश किया गया था, उस पर मत-विभाजन हो चुका होगा अथवा विपक्ष ने सामूहिक बहिर्गमन का रास्ता चुना होगा! इसका विश्लेषण बाद में करेंगे, क्योंकि यह घटनाक्रम शुक्रवार शाम तक होना था। बहरहाल इस संविधान संशोधन से पहले ही, गुरुवार देर रात्रि, 2023 में पारित किए गए कानून की सरकारी अधिसूचना भी जारी कर दी गई।

इसके क्या ‘तकनीकी कारण’ हो सकते हैं? यह लोकतंत्र और संसद का अपमान है, क्योंकि महिला आरक्षण पर संसद में बहस जारी थी। अभी तक की चर्चा में कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, सीपीएम आदि विपक्षी दलों ने सतही तौर पर महिला आरक्षण का विरोध नहीं किया, लेकिन परिसीमन के जरिए संघीयवाद, लोकतंत्र के उल्लंघन पर सवाल और संदेह जरूर किए। हम आज तक समझ नहीं पाए हैं कि विपक्ष दिन में कितनी बार ‘लोकतंत्र की हत्या’ मान लेता है और फिर उसी लोकतंत्र की आड़ में छिप कर राजनीति भी करने लगता है? बहरहाल लोकतंत्र कभी नहीं मरता, लेकिन जो व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जो विसंगतियां हमें खोखला कर रही हैं, वे जरूर बदलनी चाहिए। लोकसभा में फिलहाल 74-75 महिला सांसद हैं। उनका प्रतिनिधित्व 13.6 फीसदी बनता है। राज्यसभा में भी यह औसत करीब 17 फीसदी है और महिला सांसद 41 हैं। यदि महिला आरक्षण कानून, अंतत:, लागू होता है, तो राज्यों की विधानसभाओं में विधायकों की संख्या 4123 से बढ़ कर 6186 हो जाएगी। पंचायत, जिला पंचायत, ब्लॉक, स्थानीय नगर निकायों में हजारों महिलाएं सक्रिय हैं। उन्हें प्रशासनिक अनुभव भी हासिल हो रहा है। वे अब ‘गूंगी गुडिय़ा’ नहीं, मासूम नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक चेतना और जागृति से भरपूर हैं। देश की ‘आधी जन-शक्ति’ को संसद, विधानसभा के स्तर पर भी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उन मायनों में यह कानून वाकई एक क्रांतिकारी, ऐतिहासिक कदम, मील-पत्थर साबित हो सकता है। इस बदलाव को रोका नहीं जाना चाहिए।

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