नारी शक्ति की पिछले सप्ताह खूब चर्चा हुई लोकसभा के अंदर और बाहर भी। चर्चा की शुरुआत प्रधानमंत्री ने खुद की दिल्ली में महिलाओं को संबोधित करते हुए विशेष सत्र से पहले। अपनी पीठ थपथपाते हुए याद दिलाया कि देश की बेटियों की हर जरूरत पर ध्यान दिया है उनकी नीतियों ने। याद दिलाया कि ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा उन्होंने दिया था और इस नारे को यथार्थ बनाने के लिए उनकी सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे लखपती दीदी और ड्रोन दीदियों को गांवों में बनाना, स्कूलों में मुफ्त सेनेटरी पैड बांटना, बैंकों से कर्ज दिलवाना उन महिलाओं को जिन्होंने कभी बैंक का दरवाजा तक नहीं देखा था और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत जो मकान बने हैं उनको परिवार की महिलाओं के नाम करवाना।

प्रधानमंत्री ने यह भाषण दिया लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर विशेष सत्र की घोषणा करने से कुछ दिन पहले। मैंने उनका भाषण ध्यान से सुना, इस बात को जांचने के लिए कि इस देश की महिलाओं के लिए उनकी चिंता राजनीतिक है या वास्तव में उनके दिल में महिलाओं के लिए खास जगह है। जब उन्होंने उज्ज्वला योजना का जिक्र किया, तो याद आया मुझे कि मैंने राजस्थान के ऐसे गांवों में महिलाओं को गैस पर खाना पकाते देखा है, जिन गांवों तक सड़क नहीं थी। सो माना जाए कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद परिवर्तन आया है महिलाओं के जीवन में, लेकिन उनकी समस्याएं राजनीतिक कदम उठाने से हल हो जाएंगी, ऐसा मैं नहीं मानती हूं। न ही मानती हूं कि लोकसभा में उनके लिए सीटें आरक्षित करने से इतना कोई खास फर्क आने वाला है।

यहां याद दिलाना चाहती हूं आपको कि पंचायतों में आरक्षण है कई सालों से महिलाओं के लिए, लेकिन देहातों में उनका जीवन वैसे का वैसा है जैसे पहले था। इसलिए कि वही महिलाएं चुनाव जीतती हैं जिनको घर के किसी मर्द का सहारा मिलता है। चुनाव जीतने के बाद भी उनके घर के पुरुष ही उनका काम संभालते हैं इसलिए कि अक्सर आज भी ग्रामीण भारत में महिलाएं अशिक्षित या अर्धशिक्षित होती हैं। लोकसभा में जो महिलाएं पहुंची हैं उनमें से आधे से ज्यादा वही हैं जिनको उनके पिता, पति या भाई ने वहां पहुंचाया है। बहुत कम महिलाएं मिलेंगी आपको संसद में जो अपनी राजनीतिक समझ या सामाजिक काम की वजह के लिए चुनी गई हैं। इसलिए मुझे बिल्कुल यकीन नहीं है कि लोकसभा की सीटों में महिलाओं के लिए आरक्षण लाने से इस देश की महिलाओं के जीवन में वे सुधार आने वाले हैं जो जरूरी हैं।

माना कि इस्लामी देशों के साथ तुलना की जाए, तो भारत की महिलाओं की स्थिति कहीं बेहतर है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पिछले सप्ताह एलान किया कि हमेशा के लिए लड़कियों को पढ़ने का अधिकार नहीं मिलेगा। ईरान की औरतें शिक्षित हैं, लेकिन उन पर हिजाब थोपा जाता है जबर्दस्ती से। महसा अमीनी को याद कीजिए। इस चौबीस साल की महिला को इतना मारा गया कि उसकी मौत हो गई थी कुछ साल पहले। उसका ‘अपराध’ यही था कि उसके बाल दिख रहे थे दुपट्टा खिसक जाने की वजह से। उसकी मौत के बाद ईरान में आंदोलन शुरू हुआ था जिसमें महिलाओं ने सरेआम अपने बुर्के उतार कर जलाए थे।

भारत में कम से कम महिलाओं का हाल इतना बुरा नहीं है, लेकिन कुछ आंकड़े आपके सामने रखना चाहती हूं। भारत में हर साल तीस हजार से ज्यादा औरतों के साथ बलात्कार होता है जिनमें से कोई पैंतीस फीसद नाबालिग लड़कियां हैं। इस शर्मनाक आंकड़े को घटाने का एक ही रास्ता है और वह है कि बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए और जल्दी से जल्दी। अक्सर ये दरिंदे दंडित होते ही नहीं हैं इसलिए कि मुकदमे कई साल चलते रहते हैं। इस दौरान बलात्कारियों की शादियां हो जाती हैं, बच्चे हो जाते हैं। जिन औरतों या बच्चियों को उन्होंने शिकार बनाया होता है उनके जीवन बर्बाद रहते हैं।

अब एक और आंकड़ा। हर साल भारत में कोई छह हजार औरतों की मौत होती है दहेज से जुड़े मामलों के कारण। यहां भी कानूनी कार्रवाई चलती है बैलगाड़ी की चाल से। जबकि अनुमान लगाया जाता है कि लाख से ज्यादा औरतें मारी जाती हैं अपने ही घरों में अपने ही मर्दों के हाथों। तो जब हम नारी शक्ति की बातें करते हैं, इन आंकड़ों को ध्यान में रख कर ही ये बातें करनी चाहिए। जब हम महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, तो इन आंकड़ों को याद करके करनी चाहिए।

आरक्षण महिलाओं के लिए हो जाएगा जरूर। ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जो इसका विरोध करेगा इसलिए कि राजनीतिक लाभ नहीं है नारी शक्ति का विरोध करने में। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने जब पिछली बार किया था इस बहाने कि वे आरक्षण में आरक्षण चाहते थे पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए। इसकी आवश्यकता थी नहीं, वह आप खुद देख सकते हैं लालू और मुलायम सिंह यादव के परिवारों को देख कर। लालू यादव की बेटियां और पत्नी सब रह चुकी हैं सांसद और अखिलेश यादव की पत्नी उनके साथ दिखती है संसद में।

क्या उनके सांसद बनने के बाद उनके समाज की बेटियों का हाल अच्छा हुआ है? इस सवाल का जवाब मैं आपको एक और आंकड़ा देकर देती हूं। सबसे ज्यादा बलात्कार दर्ज होते हैं बिहार और उत्तर प्रदेश में। नारी शक्ति अच्छा नारा है। महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण अच्छी बात लगती है, लेकिन इन चीजों से भारत की नारियों के जीवन बेहतर हो जाएंगे, ऐसा हम कह नहीं सकते हैं, लेकिन ऐसा करने से इस देश की महिलाओं की समस्याएं कम न होंगी।

आरक्षण, परिसीमन और सियासी दांव: क्या था असली एजेंडा | बहस के पीछे की कहानी

सरकार और भाजपा ने संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर एक विमर्श गढ़ने की कोशिश की। यह विमर्श पूरी तरह से गलत था: यह विकृत तथ्यों और कानून की संदिग्ध व्याख्या पर आधारित था। 16 अप्रैल, 2026 को यह कानून बिल्कुल स्पष्ट था। संविधान (106वां) संशोधन सितंबर, 2023 में पारित हो चुका था और यह देश के संविधान का हिस्सा था। इसने संविधान में अनुच्छेद 334ए को जोड़ा, लेकिन केवल सरकार ही जानती है कि किन कारणों से इस संशोधन को अधिसूचित नहीं किया गया था। (इसे 16 अप्रैल की रात को अधिसूचित किया गया)। संशोधन में लोकसभा की वर्तमान संख्या (543 सदस्य) में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था। महिलाओं के लिए आरक्षण एक स्थापित तथ्य था। अनुच्छेद 334ए पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसके विपरीत जो विमर्श गढ़ा गया, वह झूठ था।-तवलीन सिंह

Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
June 2026
M T W T F S S
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
2930  
Exit mobile version