पिछला शुक्रवार कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। पहला, मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार को 2014 में सत्ता में आने के बाद पहली बार हार का सामना करना पड़ा। दूसरा, वर्ष 2011 के बाद लोकसभा में पहली बार संविधान संशोधन विधेयक गिरा और यह विधेयक अपेक्षित बहुमत के लिए 352 मत नहीं जुटा पाया तथा 54 मतों से गिर गया। संविधान 131वां संशोधन विधेयक 2026 का उद्देश्य वर्ष 2029 के चुनावों से पूर्व महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करना था। 

इसका मूल कारण यह था कि इसे परिसीमन विधेयक 2026 से जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत 2016 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन किया जाना है। सरकार ने लोकसभा की सीटों को वर्तमान 543 से 850 करने और राज्यों में विधानसभा की सीटों में 50 प्रतिशत की वृद्धि करने का प्रस्ताव किया, किंतु विपक्षी दलों के सरकार के साथ टकराव और विश्वास के अभाव के चलते यह नहीं हो सका। यह विधेयक उस समय लाया गया जब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। इससे अविश्वास बढ़ा तथा सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत द्वारा किसी समाधान तक पहुंचने की संभावनाएं कम हो गईं। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि विवादों के समाधान की जो परंपरागत विधियां थीं, वे पूर्णत: धराशायी हो गईं। 

क्षेत्रीय दल हमेशा राष्ट्रीय सुधारों से अधिक अपने गणित को महत्व देते हैं। तथापि सरकार लोकसभा के जनादेश से बच नहीं सकती और उसे भविष्य के लिए सबक लेना होगा। अपने ही विधेयक को पारित कराने में विफल रहने से सरकार की वह सीमा सामने आ गई कि वह अपने बलबूते पर बदलाव नहीं ला सकती। विशेषकर तब जब संस्थागत निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे हों। 

विपक्ष के लिए यह क्षण इस बात का अहसास करता है कि जब वह एकजुट होता है, एक आवाज में बोलता है और साथ रहता है तो उसे आगे बढऩे से कोई नहीं रोक सकता। विपक्ष ने कहा कि यह विधेयक जल्दबाजी में लाया गया और सरकार ने अपने 2023 के रुख को बदल दिया तथा सरकार के इस रुख पर प्रश्न उठाया कि महिला आरक्षण विधेयक वर्तमान में जारी जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा जिसमें जाति जनगणना भी हो रही है। इसके साथ ही परिसीमन के संस्थागत तंत्र के बारे में भी अविश्वास व्यक्त किया गया और इस आशंका को बल दिया गया कि प्रतिनिधित्व में समानता और संघीय निष्पक्षता के बीच नाजुक संतुलन बिगड़ सकता है और राज्य एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं। 

किंतु विपक्ष अपनी इस जीत पर लंबे समय तक हर्षोल्लास नहीं मना पाएगा क्योंकि विधेयक पर सरकार को हराना और राष्ट्रीय नैरेटिव को जीतना दो अलग बातें हैं और उसे ऐसी भाषा अपनानी पड़ेगी जिससे वह न केवल भाजपा के जाल से निकले, अपितु जनता को यह भी समझाए कि उसने इस विधेयक का विरोध क्यों किया और वह इस विधेयक के स्थान पर क्या चाहता है क्योंकि उसका राजनीतिक तथा चुनावी भविष्य इस पर निर्भर है।  क्षेत्रीय क्षत्रप, विशेषकर तृणमूल की ममता और द्रमुक के स्टालिन इस समय राज्य विधानसभा चुनावों का सामना कर रहे हैं और उन्हें महिला आरक्षण विधेयक के जाल में नहीं फंसना चाहिए, अपितु अपने राज्यों को सीटों के पुनॢवतरण से होने वाले नुकसान पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए क्योंकि इससे विपक्ष का प्रहार कमजोर हो जाएगा। भाजपा इस ऐतिहासिक सुधार का श्रेय लेती है और अब वह इसको लागू कराने में विफल रही तो वह अगले 3 वर्ष प्रत्येक महिला को यह बताती रहेगी कि हमने उन्हें शक्ति देने का प्रयास किया, किंतु कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इसका समर्थन नहीं किया। 

उल्लेखनीय है कि संसद में 1976 और 2001 में दक्षिण भारत के राज्यों की इन आशंकाओं के चलते परिसीमन पर रोक लगा दी थी कि इससे देश की राजनीति उत्तरी राज्यों के पक्ष में हो जाएगी जिससे क्षेत्रीय विषमता बढ़ेगी। अब 2027 की जनगणना पर परिसीमन की छाया पड़ेगी। तथापि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। लोकसभा में इस विधेयक की पराजय से नारी शक्ति के सपने को साकार करने पर विराम नहीं लगा है। महिला आरक्षण विधेयक के लोकसभा में गिरने के बावजूद भी संसद ने वर्ष 2023 के कानून के अंतर्गत महिलाओं के आरक्षण के लिए संसद की प्रतिबद्धता जताई थी और इसके लिए राजनीतिक आम सहमति ली थी। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे राजनेता और राजनीतिक दलों को दक्षिण बनाम उत्तर जैसे मुद्दों को हवा नहीं देनी चाहिए। जाति के प्रश्न को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए और ऐसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए, जो देश को विभाजित करने की बजाय एकजुट करते हों।  
सरकार को इस पराजय से सबक लेना चाहिए। उसे अपने आचरण में बदलाव लाना चाहिए क्योंकि अभी तक संसद में इस शैली से कार्य कर रही थी कि विजेता का सब कुछ होता है। कार्यपालिका के रूप में सरकार की न केवल यह जिम्मेदारी है कि वह कानून-विधान लाए, अपितु यह भी ििक वह सभी पक्षों की ङ्क्षचताओं को सुने। इस मामले में जल्दबाजी में परिसीमन के बारे में लोगों की आशंकाएं थीं। जिससे राजनीतिक मानचित्र नए सिरे से खींचा जाएगा और प्रतिनिधित्व और संघवाद के बीच नाजुक संतुलन गड़बड़ाएगा।  
कुल मिलाकर, यदि महिला आरक्षण विधेयक का कार्यान्वयन टलता रहता है, भाजपा की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लग सकता है। विपक्ष उसके कार्यान्वयन में विलंब होने पर उस पर हमला कर सकता है। किंतु अपनी अतीत की अस्पष्टता के चलते विपक्ष इस मामले में कमजोर पड़ता है। तथापि नारी शक्ति देश की जनसंख्या में 50 प्रतिशत है और उनके लिए आरक्षण का मुद्दा दीर्घकालिक राजनीतिक उथल-पुथल का मुद्दा रहा है। महिला आरक्षण एक शक्तिशाली विचार है और इसे लागू किया जाना चाहिए।-पूनम आई. कौशिश

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